अन्याय और अहंकार से नष्ट होता है विवेक,सत्य-धर्म की विजय निश्चित–आचार्य शिवप्रसाद ममगांई

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड में स्थित आध्यात्मिक सांस्कृतिक नगरी श्रीनगर के कंसमर्दनी मंदिर मार्ग स्थित ग्राउंड में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के षष्ठम दिवस पर प्रसिद्ध कथावाचक आचार्य शिवप्रसाद

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड में स्थित आध्यात्मिक सांस्कृतिक नगरी श्रीनगर के कंसमर्दनी मंदिर मार्ग स्थित ग्राउंड में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के षष्ठम दिवस पर प्रसिद्ध कथावाचक आचार्य शिवप्रसाद ममगांई ने भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन करते हुए कंस वध,जरासंध के चरित्र तथा भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के पावन प्रसंगों पर विस्तार से प्रकाश डाला। कथा के दौरान उन्होंने इन प्रसंगों के आध्यात्मिक,नैतिक और सामाजिक संदेशों को वर्तमान जीवन से जोड़ते हुए श्रद्धालुओं को सत्य,धर्म,सदाचार, विवेक और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। कथा स्थल पर भक्तिमय वातावरण के बीच श्रद्धालुओं ने श्रीमद्भागवत के दिव्य प्रसंगों का श्रवण कर धर्म और आध्यात्मिकता के संदेशों को आत्मसात किया। आचार्य शिवप्रसाद ममगांई ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कंस का वध केवल एक अत्याचारी शासक के अंत की कथा नहीं है,बल्कि यह मानव जीवन के लिए गहरा आध्यात्मिक संदेश भी है। जब मनुष्य के भीतर अहंकार,क्रोध,लोभ,ईर्ष्या और अन्याय की प्रवृत्तियां बढ़ने लगती हैं, तब उसका विवेक धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है। व्यक्ति सही और गलत के बीच अंतर करना भूल जाता है और अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए दूसरों के अधिकारों का हनन करने लगता है। उन्होंने कहा कि कंस सत्ता के अहंकार,भय और अत्याचार का प्रतीक था। उसने अपने स्वार्थ और सत्ता को बचाए रखने के लिए निर्दोषों पर अत्याचार किए,लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने अधर्म का अंत कर धर्म की स्थापना की। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी शक्ति,पद,प्रतिष्ठा अथवा सामर्थ्य के बल पर अन्याय को अनंत समय तक कायम नहीं रख सकता। आचार्य ने कहा कि श्रीकृष्ण की लीलाएं हमें अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर कहीं न कहीं क्रोध,अहंकार,ईर्ष्या,द्वेष और लोभ जैसी कमजोरियां मौजूद रहती हैं। यदि इन पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया,तो ये हमारे विवेक,संबंधों और जीवन की शांति को प्रभावित करती हैं। इसलिए सच्चे अर्थों में कंस वध का संदेश अपने भीतर की बुराइयों पर विजय प्राप्त करना है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि अन्याय के सामने मौन रहने के बजाय सत्य और धर्म का साथ दें। जीवन में ऐसा आचरण अपनाएं,जिससे किसी निर्दोष को कष्ट न पहुंचे और समाज में न्याय,सद्भाव तथा मानवीय मूल्यों की स्थापना हो सके। जरासंध के चरित्र का वर्णन करते हुए आचार्य ममगांई ने कहा कि केवल शारीरिक बल,सैन्य शक्ति,धन-संपत्ति अथवा राजनीतिक सामर्थ्य किसी व्यक्ति को महान नहीं बना सकते। शक्ति तभी सार्थक होती है,जब उसका उपयोग धर्म,न्याय और लोककल्याण के लिए किया जाए। यदि सामर्थ्य के साथ विवेक,संयम और मर्यादा का अभाव हो जाए,तो वही शक्ति समाज के लिए विनाशकारी बन सकती है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी नीति,बुद्धिमत्ता,धैर्य और धर्मसम्मत आचरण से यह सिद्ध किया कि कठिन परिस्थितियों में केवल बल प्रयोग करना ही समाधान नहीं होता। सही समय पर उचित निर्णय लेना,परिस्थितियों को समझना और धर्म के अनुरूप आचरण करना भी उतना ही आवश्यक है। आचार्य ने कहा कि जरासंध का प्रसंग हमें सिखाता है कि अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने के लिए साहस के साथ-साथ विवेकपूर्ण रणनीति तथा सामूहिक प्रयास भी जरूरी हैं। व्यक्ति को अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने,अपमानित करने अथवा भयभीत करने के लिए नहीं,बल्कि कमजोर और जरूरतमंद लोगों की सहायता तथा समाज के कल्याण के लिए करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वास्तविक महानता दूसरों पर अधिकार जमाने में नहीं,बल्कि अपने सामर्थ्य से दूसरों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में है। जो व्यक्ति शक्ति के साथ विनम्रता और विवेक को अपनाता है,वही समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनता है। भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के विवाह प्रसंग का वर्णन करते हुए आचार्य शिवप्रसाद ममगाईं ने कहा कि माता रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम,अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण की प्रतीक हैं। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों और सांसारिक दबावों के बीच भी भगवान श्रीकृष्ण को अपने आराध्य एवं जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करने का दृढ़ संकल्प बनाए रखा। उन्होंने बताया कि माता रुक्मिणी ने भगवान श्रीकृष्ण को पत्र लिखकर अपनी भावनाएं व्यक्त की और उनसे अपनी रक्षा तथा स्वीकार करने की प्रार्थना की। यह प्रसंग भक्त और भगवान के बीच अटूट विश्वास,निष्कपट प्रेम और पूर्ण शरणागति की भावना को उजागर करता है। आचार्य ने कहा कि आध्यात्मिक दृष्टि से रुक्मिणी हरण जीवात्मा की परमात्मा के प्रति अनुरक्ति,सांसारिक बंधनों से मुक्ति की आकांक्षा और ईश्वर की शरण में जाने का प्रतीक है। जब भक्त का प्रेम निष्कपट होता है और उसका विश्वास अडिग रहता है,तब वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी आशा और साहस बनाए रखता है। उन्होंने कहा कि माता रुक्मिणी का जीवन हमें सिखाता है कि श्रद्धा,विश्वास और धैर्य मनुष्य की सबसे बड़ी आध्यात्मिक शक्तियां हैं। परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों,व्यक्ति को अपने आदर्शों और सत्य के मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए। ईश्वर के प्रति अनन्य निष्ठा मनुष्य को भय,भ्रम और निराशा से बाहर निकालकर आत्मिक शांति तथा सकारात्मकता की ओर ले जाती है। कथा के दौरान आचार्य ममगाईं ने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण का प्रत्येक प्रसंग मानव जीवन को नई दिशा देने की क्षमता रखता है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं,बल्कि उनमें जीवन जीने की कला,कर्तव्यबोध,नैतिकता,विवेक और मानवता के गहरे सूत्र समाहित हैं। उन्होंने कहा कि कंस वध हमें अहंकार और बुराइयों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है, जरासंध का प्रसंग शक्ति के सदुपयोग और विवेकपूर्ण निर्णय का संदेश देता है,जबकि रुक्मिणी हरण अनन्य भक्ति,अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण की महत्ता समझाता है। आचार्य ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि कथा श्रवण का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन में शामिल होना नहीं,बल्कि उसके संदेशों को अपने व्यवहार में उतारना है। यदि व्यक्ति अपने जीवन में सत्य,करुणा,संयम,न्याय,परोपकार और सदाचार को स्थान देता है,तो परिवार में सुख-शांति और समाज में सद्भाव का वातावरण स्वतः मजबूत होता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में समाज को ऐसे विचारों और संस्कारों की आवश्यकता है,जो लोगों को स्वार्थ से ऊपर उठकर मानवता,सेवा और नैतिक जिम्मेदारी का बोध कराएं। धर्म का वास्तविक स्वरूप भी यही है कि मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करे,दूसरों के प्रति संवेदनशील बने और सत्य के मार्ग पर चलते हुए लोककल्याण के लिए कार्य करे। श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के षष्ठम दिवस पर विधायक देवप्रयाग विनोद कण्डारी,पूर्व जिला पंचायत सदस्य राजेश्वरी जोशी,ग्राम प्रधान मनोज जोशी,व्यापार मंडल अध्यक्ष अनुज जोशी,कविता जोशी,सपना जोशी,सुबोध काला,ऊषा काला,उर्मिला काला,एकादशी पाण्डेय,प्रेमा,शकुन्तला थपलियाल,वंदना,अक्षत,अंशुमन, अनिका,आचार्य महेश भट्ट और बृजेश भट्ट सहित अनेक गणमान्य नागरिक तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य प्रसंगों से प्रेरणा लेते हुए धर्म,भक्ति और सदाचार के मार्ग पर चलने का संदेश ग्रहण किया। श्रीमद्भागवत कथा ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि अहंकार और अन्याय चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों,उनका स्थायी आधार नहीं होता। सत्य,विवेक,धर्म और निष्कपट भक्ति ही मानव जीवन को सार्थक दिशा प्रदान करते हैं।

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