अलकनंदा के पावन तट पर आस्था का महापर्व-श्रीनगर कमलेश्वर महादेव मंदिर में 25 जनवरी को होगी पौराणिक दिव्य घृत कमल पूजा

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड के श्रीनगर में पवित्र अलकनंदा नदी के दिव्य तट पर स्थित प्राचीन कमलेश्वर महादेव मंदिर सनातन संस्कृति,आस्था और साधना का अनुपम केंद्र है। कल-कल बहती

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड के श्रीनगर में पवित्र अलकनंदा नदी के दिव्य तट पर स्थित प्राचीन कमलेश्वर महादेव मंदिर सनातन संस्कृति,आस्था और साधना का अनुपम केंद्र है। कल-कल बहती अलकनंदा की निर्मल धारा के सान्निध्य में विराजमान यह सिद्धपीठ न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है,बल्कि इससे जुड़ी पौराणिक कथाएं,सामाजिक मान्यताएं और दुर्लभ अनुष्ठान इससे विशेष पहचान प्रदान करती हैं। इसी पावन परंपरा के अंतर्गत प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली घृत कमल पूजा इस वर्ष 25 जनवरी बुधवार (माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी) को विधि-विधान एवं श्रद्धा भाव के साथ संपन्न होगी। यह पूजा विवाह में आ रही बाधाओं के निवारण,कामासत्त भावनाओं के संयम,सामाजिक संतुलन तथा जगत कल्याण की कामना से जुड़ी एक अत्यंत प्राचीन और पौराणिक परंपरा है। कमलेश्वर महादेव मंदिर के महन्त आशुतोष महाराज ने जानकारी देते हुए बताया कि यह विशेष पूजा आदि काल से चली आ रही है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवताओं ने भगवान शिव को विवाह हेतु मनाने के लिए सांग पांग और अठारह आवरणों से युक्त घृत कमल पूजन किया था। इस अनुष्ठान में घी से शिवलिंग का आवरण,विविध व्यंजनों का भोग तथा विशेष पूजा विधियां सम्मिलित होती हैं,जिनका उद्देश्य मानव की कामनाओं को संयमित कर जीवन में संतुलन स्थापित करना है। महन्त आशुतोष महाराज ने बताया कि इस पूजा का संबंध तारकासुर वध की पौराणिक कथा से भी जुड़ा है। ब्रह्मा से वरदान प्राप्त कर तारकासुर ने समस्त देवताओं को पीड़ित करना प्रारंभ कर दिया था।‌ देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव को तपस्या से जगाने हेतु कामदेव को भेजा गया,जिससे क्रोधित होकर शिवजी ने उन्हें भस्म कर दिया। बाद में माता रति के विलाप और देवताओं के अनुरोध पर शिवजी का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कामदेव को द्वापर युग में अनिरुद्ध के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। इसके पश्चात माता पार्वती ने हिमालय पुत्री के रूप में जन्म लेकर घोर तपस्या की और भगवान शिव से विवाह संपन्न हुआ। इसी पौराणिक प्रसंग के स्मरण स्वरूप कमलेश्वर महादेव में यह पूजा आज भी जीवंत परंपरा के रूप में संपन्न की जाती है,मान्यता है कि इस अवसर पर की जाने वाली दिगम्बर अवस्था में लोट परिक्रमा समाज में व्याप्त बुराइयों के शमन और लोककल्याण के लिए की जाती है। महन्त आशुतोष महाराज ने कहा कि घृत कमल पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि संयम,संस्कार और सामाजिक चेतना का प्रतीक है। इस पूजा में सम्मिलित होने से श्रद्धालुओं को मानसिक शांति,पारिवारिक संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा की अनुभूति होती है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से इस पावन अवसर पर मंदिर पहुंचकर पुण्य लाभ प्राप्त करने का आह्वान किया। अंत में उन्होंने कहा भगवान श्री कमलेश्वर महादेव की कृपा सभी श्रद्धालु भक्तजनों पर बनी रहे और यह प्राचीन परंपरा समाज को आध्यात्मिक दिशा देती रहे।

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