अहंकार के शून्य में ही अवतरित होती है ईश्वर कृपा हृदय की निर्मलता और प्रेम से ही खुलता है भक्ति का दिव्य द्वार-डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। ईश्वर की प्राप्ति न तो जटिल कर्मकांडों की अनिवार्यता में निहित है और न ही शास्त्रों के अपार ज्ञान मात्र में। सच्ची ईश्वरीय अनुभूति उस क्षण संभव

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। ईश्वर की प्राप्ति न तो जटिल कर्मकांडों की अनिवार्यता में निहित है और न ही शास्त्रों के अपार ज्ञान मात्र में। सच्ची ईश्वरीय अनुभूति उस क्षण संभव होती है,जब मनुष्य अपने भीतर बसे अहंकार को त्यागकर हृदय को प्रेम,विनम्रता और विशुद्ध भावना से भर लेता है। यही दिव्य संदेश मां दक्षिण काली के परम सेवक डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला ने अपनी प्रवचन ग्रन्थावली में अत्यंत सरल,किंतु गहन शब्दों में व्यक्त किया है। डॉ.चमोला के अनुसार परम ज्ञानी या कर्मकांडी होना अपने आप में कोई दोष नहीं है,किंतु जब ज्ञान और कर्म अहंकार का रूप ले लेते हैं,तब वही साधना ईश्वर से दूरी का कारण बन जाती है। बहुधा ज्ञानी इस भाव में डूबा रहता है कि ‘मैं ही सब कुछ हूं’। यह भाव उसे भीतर से भर देता है और जहां अहंकार का वास होता है,वहां ईश्वर के लिए स्थान शेष नहीं रहता। इसके विपरीत भक्ति के मार्ग पर चलने वाला साधक स्वयं को अपूर्ण मानता है। वह हर क्षण कुछ पाने,कुछ सीखने और आत्मिक उन्नति की आकांक्षा रखता है। यही अपूर्णता का बोध उसे विनम्र बनाता है और यही विनम्रता उसे पराशक्ति के निकट ले जाती है। एक समय ऐसा आता है जब अहंकार स्वतः विलीन होने लगता है और साधक ईश्वर के सान्निध्य का अनुभव करने लगता है। प्रवचन ग्रन्थावली में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सच्ची भक्ति का मार्ग बाहरी आडंबरों से नहीं,बल्कि अंतःकरण की शुद्धि से होकर गुजरता है। ईश्वर को पाने के लिए ‘मैं’ के भाव का विसर्जन अनिवार्य है। जब मनुष्य स्वयं को रिक्त करता है,तभी ईश्वर उसमें प्रवेश करते हैं। यह प्रवचन आज के समाज के लिए गहन आत्मचिंतन का संदेश भी है। डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला के विचार मनुष्य को यह स्मरण कराते हैं कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग प्रदर्शन और अहंकार से नहीं,बल्कि प्रेम,करुणा और समर्पण से होकर जाता है। जब व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर स्वयं को छोटा मानता है और हृदय को विशाल बनाता है,तभी उसका जीवन सच्चे अर्थों में सार्थक होता है। ऐसे आध्यात्मिक विचार न केवल व्यक्ति को आत्मिक शांति प्रदान करते हैं,बल्कि समाज में सद्भाव,सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों को भी सुदृढ़ करते हैं। डॉ.चमोला के अनुसार आज के भौतिकतावादी युग में मनुष्य बाहरी उपलब्धियों में उलझकर अपने भीतर की यात्रा को भूलता जा रहा है। ऐसे समय में भक्ति का यह शाश्वत संदेश हमें स्मरण कराता है कि सच्ची शक्ति विनम्रता में और सच्चा सुख ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम में निहित है। अहंकार का त्याग, हृदय की निर्मलता और निष्काम प्रेम-यही ईश्वर प्राप्ति का परम सूत्र है और यही मानव जीवन की सच्ची सार्थकता। मां दक्षिण काली सेवक डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला (प्रवचन ग्रन्थावली से)

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