
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड में ऐसे सन्त और महापुरुषों ने जन्म लिया जो सदैव मनसा,वचना,कर्मणा से देश और समाज के लिए समर्पित रहे हैं। मन,वचन,कर्म से उत्तराखंड राज्य प्राप्ति के लिए सदैव समर्पित रहे उत्तराखण्ड के महानायक स्व.इन्द्रमणी बड़ोनी का नाम प्रमुखता से आता है। उत्तराखंड में गांधी के नाम से सुविख्यात स्व.इन्द्रमणी बड़ोनी ने पृथक राज्य उत्तराखण्ड की स्थापना के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। स्व.इंद्रमणि बड़ोनी उत्तराखंड राज्य आंदोलन के पुरोधा थे,उन्होंने उत्तराखंड राज्य का विचार जनता को दिया और जन-आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में रहकर सरकार की दमन नीतियों का अहिंसक रुप से विरोध करते हुए वर्षों तक विकट संघर्षों का नेतृत्व किया था। शासन और सत्ता के जुल्मो-सितम से टूटने के बजाय वह और ज्यादा ताकत के साथ उभरे,अलग पर्वतीय राज्य की उनकी चाहत इससे और भी ज्यादा मुखर होती गई। उत्तराखंड के गांधी के नाम से प्रसिद्ध लोकनायक स्व.इन्द्रमणि बडोनी का जन्म 24 दिसम्बर सन 1925 को टिहरी जिले के जखोली ब्लॉक के अखोड़ी गांव में हुआ था। बेहद मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे इंद्रमणि बडोनी का जीवन अत्यधिक अभावों के साथ गुजरा। बचपन से ही उन्हें झरने,नदियां,पशु-पक्षी व ऊंचे पर्वत लुभाते का शौक था,वे बचपन से ही प्रकृति में संगीत और नृत्य कला में पारंगत हुए,बाद में वह लोककला के मर्मज्ञ भी बन गये। इंद्रमणि बड़ोनी की प्रारम्भिक शिक्षा की बात करें तो स्व.बड़ोनी की प्रारम्भिक शिक्षा अपने गांव अखोड़ी के स्कूल से हुई । आगे की शिक्षा के लिए बड़ोनी टिहरी चले गए। वहां उन्होंने प्रताप इंटर कॉलेज से हाईस्कूल व इंटरमिडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन दिनों उच्च शिक्षा के लिए लोग नैनीताल या देहरादून जाया करते थे। उच्च शिक्षा के लिए स्व.इंद्रमणि बड़ोनी देहरादून चले गए। वहां उन्होंने डीएवी कॉलेज से स्नातक परीक्षा पास की। इंद्रमणि बडोनी बचपन से ही विद्रोही एवं अल्हड़ प्रकृति के स्वतंत्रता प्रेमी व्यक्ति थे। एक बार वह टिहरी में अपने मित्रों के साथ आये थे उन दिनों टिहरी रियासत में प्रवेश करने के लिए शुल्क चवन्नी के रुप में देना पड़ता था। तिलवाड़ा में मालगुजारी टैक्स वसूला जाता था। इंद्रमणि ने टैक्स देने से बिल्कुल मना कर दिया जिसके फलस्वरूप पुलिस ने इंद्रमणि बड़ोनी को गिरफ्तार कर लिया,टिहरी रियासत के मालगुजार ने खुद टैक्स जमा कर उन्हें छुड़वा दिया था। टिहरी के प्रताप शाह इन्टरमीडिएट कालेज से इंद्रमणि स्नातक परीक्षा पास करने के बाद आजीविका के लिए मुम्बई चले गए,परन्तु उन्हें वहां सफलता नहीं मिली थी। मुम्बई में वह ग्रामीण विकास,राष्ट्रीय उत्थान जैसे अहम विषयों पर लोगों से चर्चा करते रहते थे। इंद्रमणि ने पुनः सन 1953 में वापिस उत्तराखंड आ गये और अपने गांव अखोड़ी तथा विकास खंड जखोली में उपलब्ध स्थानीय संसाधनों की सहायता से विकास कार्यों से जुड़ गये थे। उन्हीं दिनों महात्मा गांधी की प्रमुख शिष्या मीराबेन टिहरी के गांवों में भ्रमण के लिए आयीं तो वहां उनकी भेंट इंद्रमणि बड़ोनी से हुई। मीराबेन से मुलाकात के बाद इंद्रमणि बड़ोनी के जीवन की धारा ही मानो बदल गई,अब वे सत्य और अहिंसा के पुजारी बन गये। इस घटना के बाद बड़ोनी सत्याग्रह का महत्व समझने लगे और उत्तराखण्ड में लोग उन्हें उत्तराखंड का गांधी के नाम से पुकारने लगे। शिक्षा के प्रति गांधीवादी इंद्रमणि बडोनी बड़े आग्रही और अति संवेदनशील थे,पुस्तकों का संग्रहण एवं पठन-पाठन उनका परम शौक था। उन्होंने गढ़वाल में कई स्कूल खोले,जिनमें इंटरमीडिएट कॉलेज कठूड,मैगाधार,धूतू एवं उच्च माध्यमिक विद्यालय बुगालीधार प्रमुख हैं। दूसरों की सहायता एवं उनका कार्य सिद्धि करना वह अपना परम कर्तव्य मानते थे। इंद्रमणि गढ़वाली सभ्यता व संस्कृति के अनन्य प्रेमी थे,उनका विचार रहता था कि आदमी को अपनी संस्कृति एवं परंपरा को नहीं छोड़ना चाहिए,व्यक्ति को हमेशा ऐसा भोजन एवं वस्त्र ग्रहण करना चाहिए जो उन्हें हर परिस्थिति में प्राप्त हो सकें। इंद्रमणि बडोनी ने उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर एवं लोक कलाओं का गहनता से अध्ययन किया था,वह कहते थे कि उत्तराखंड क्या है,यहां की परम्पराए क्या है। यहां के महापुरुषों ने संसार और मानवता के लिए जो महान कार्य किये हैं,यही संदेश हमें जन-जन तक पहुंचाना चाहिए। रंगमंच के माध्यम से समाज सेवा करने का लक्ष्य बनाकर उन्होंने कुछ लोगों को साथ लेकर एक नाट्य मंडली का गठन किया। बेहद कम समय में इंद्रमणि एक कुशल रंगकर्मी के रूप में उभरे। वह साथी कलाकारों को नृत्य,हावभाव,मुखमुद्रा,शारीरिक चेष्टाएं आदि सिखाते थे। इंद्रमणि ने ही गढ़वाल के लोक नृत्यों की कलात्मकता से लोगों का साक्षात्कार कराया था। इंद्रमणि स्वयं नृत्य कला में सिद्धहस्त थे। उत्तराखण्ड की महान विभूतियों में से एक माधो सिंह भंडारी की गाथा का नाट्य मंचन सर्वप्रथम इन्होंने ही किया था। इस नाटिका को उन्होंने गढ़वाल के अलावा दिल्ली व मुम्बई में भी मंचित किया गया था। सन 1956 में गणतन्त्र दिवस के अवसर पर दिल्ली के राजपथ पर उत्तराखंड के पारम्परिक केदार नृत्य की झांकी प्रस्तुत की गई थी,जिसकी विभिन्न प्रदेशों के दर्शकों के अलावा भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू व महामहिम राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद ने भी सराहना की थी। लोक कलाओं की अभिरुचि के अलावा इंद्रमणि को पहाड़ी वाद्य यंत्रों को बजाने का बेहद शौक था। उत्तराखंड के लोकवाद्यों में हुड़का एवं ढोल वादन में इंद्रमणि बड़ोनी दक्ष थे। वह प्रायः यत्र-तत्र ढोल सागर की चर्चा किया करते थे। इंद्रमणि उत्तराखंड के आर्थिक विकास हेतु पर्यटन को बढ़ावा देना चाहते थे। उन्होंने व्यक्तिगत प्रयास से प्रसिद्ध पर्यटन स्थल सहस्त्रताल,पंवाली-काठा व खतलिंग ग्लेशियर को विश्वभर के पर्यटकों में आकर्षण का केन्द्र बना दिया था। इंद्रमणि बड़ोनी ने अपनी ग्रामसभा अखोड़ी से स्वतंत्र भारत के प्रथम पंचायत चुनाव में ग्राम प्रधान के रूप में निर्वाचित होकर राजनीति में प्रवेश किया और फिर जखोली ब्लाक के ब्लाक प्रमुख बनें। सन् 1967 में प्रथम देवप्रयाग विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से प्रथम बार विधायक बने और तीन बार देवप्रयाग विधानसभा के विधायक चुने गये। इंद्रमणि बड़ोनी एक बेहद कुशल वक्ता थे,उनकी भाषा सारगर्भित एवं प्रभावोत्पादक रहती थी। बगैर किसी लाग-लपेट के सीधी-सादी बोली में वे बेहद ही सरलता से अपनी बात कह जाते थे। गंभीर और गूढ़ विषयों पर उनकी पकड़ थी। सन 1979 में मसूरी में उत्तराखंड क्रान्ति दल का गठन हुआ इसके वह आजीवन सदस्य बने रहे। सन 1988 में उत्तराखंड क्रान्ति दल के झण्डे के नीचे 105 दिवस की तवाघाट से देहरादून तक उन्होंने पदयात्रा की। इंद्रमणि बड़ोनी ने पृथक पर्वतीय उत्तराखंड के सभी नगर,गांवों तक जनसंपर्क कर राज्य के गठन की बात घर-घर तक पहुंचाई। अलग पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड निर्माण की मांग पर पदयात्राओं के कारण वह पर्वतीय लोगों के हृदय पर रच बसने लगे,इन्द्रमणी बड़ोनी बेहद सरल होने के कारण पर्वतीय क्षेत्र उत्तराखंड में जनता उनके दर्शनों के लिए उमड़ने लगी। उत्तराखंड में स्व.इंद्रमणी बड़ोनी जनप्रिय नेता बन गये। उन्होंने सन 1992 में मकर संक्रान्ति के अवसर पर बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में गैरसैण को उत्तराखंड की राजधानी घोषित किया। उत्तर प्रदेश सरकार ने सन 1994 को 27 प्रतिशत के आरक्षण की घोषणा की,जिसका उन्होंने पुरजोर विरोध प्रारम्भ किया। 2 अगस्त सन 1994 को पौडी के प्रेक्षागृह के समीप बड़ोनी राज्य प्राप्ति के लिए आमरण अनशन पर बैठे गये। अलग पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड के आन्दोलन के लिए बड़ोनी ने 30 दिन का आमरण अनशन कर जनता में जोश भरने का काम किया,जिससे सम्पूर्ण उत्तराखंड का जनमानस अपने महानायक के पीछे राज्य प्राप्ति के लिए लामबन्द होने लगा। उत्तराखंड राज्य प्राप्ति के लिए स्व.इन्द्रमणी बड़ोनी निरन्तर जन-संघर्ष करते हुए 18 अगस्त सन 1999 को ऋषिकेश के विट्ठल आश्रम में हमेशा के लिए चिरनिंद्रा में लीन हो गए। स्व.इंद्रमणी बड़ोनी का जीवन त्याग,तपस्या व बलिदान की एक जिन्दा मिसाल है। उत्तराखंड राज्य प्राप्ति आंदोलन के इतिहास को जब कभी लिपिबद्ध किया जायेगा,उसमें इंद्रमणि बड़ोनी का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा।