एनआईटी श्रीनगर में शोध की गुणवत्ता निखारने की पहल-पांच दिवसीय राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में देशभर के विशेषज्ञ शोधार्थियों को देंगे अनुसंधान एवं अकादमिक लेखन के गुर

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान एनआईटी श्रीनगर के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग की ओर से अनुसंधान की गुणवत्ता,शोधपरक लेखन की दक्षता तथा अकादमिक दृष्टिकोण को सशक्त बनाने के

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान एनआईटी श्रीनगर के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग की ओर से अनुसंधान की गुणवत्ता,शोधपरक लेखन की दक्षता तथा अकादमिक दृष्टिकोण को सशक्त बनाने के उद्देश्य से पांच दिवसीय अल्पकालिक पाठ्यक्रम (एसटीसी) का आयोजन किया जा रहा है। अनुसंधान पद्धति एवं शोधपरक लेखन-विधियां एवं व्यवहार विषय पर आधारित इस राष्ट्रीय स्तर के शैक्षणिक कार्यक्रम का शुभारंभ 29 अक्टूबर को संस्थान परिसर में हुआ। यह पाठ्यक्रम 29 अक्टूबर से 2 नवंबर 2026 तक आयोजित किया जाएगा। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों,शोधार्थियों,संकाय सदस्यों तथा विभिन्न शैक्षणिक विषयों से जुड़े प्रतिभागियों की अनुसंधान क्षमता,अकादमिक लेखन कौशल और शोध की वैज्ञानिक समझ को विकसित करना है। पांच दिवसीय इस पाठ्यक्रम के माध्यम से प्रतिभागियों को अनुसंधान की विभिन्न पद्धतियों,शोध समस्या की पहचान,शोध दृष्टिकोण के विकास,उपयुक्त अनुसंधान विधियों के चयन तथा प्रभावशाली अकादमिक लेखन के व्यावहारिक पक्षों से परिचित कराया जाएगा। उद्घाटन समारोह का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर एनआईटी उत्तराखंड के कार्यवाहक निदेशक प्रो.करुणेश कुमार शुक्ला मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे,जबकि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग के प्रोफेसर प्रो.विनोद मिश्रा ने विशिष्ट अतिथि के रूप में समारोह की गरिमा बढ़ाई। कार्यक्रम में अधिष्ठाता (योजना एवं विकास) प्रो.विवेक श्रीवास्तव,अधिष्ठाता (अनुसंधान एवं परामर्श) डॉ.धर्मेन्द्र त्रिपाठी,कुलसचिव हरि मोल आजाद तथा संयोजक डॉ.जागृति सहारिया सहित संस्थान के संकाय सदस्य,विभागाध्यक्ष,अधिष्ठाता,प्रतिष्ठित वक्ता और विभिन्न विषयों के प्रतिभागी मौजूद रहे। अल्पकालिक पाठ्यक्रम की संयोजक डॉ.रेणु भदोला डंगवाल ने स्वागत संबोधन प्रस्तुत करते हुए कहा कि गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान की अकादमिक पहचान और बौद्धिक विकास का महत्वपूर्ण आधार है। शोध केवल तथ्यों और सूचनाओं को एकत्रित करने तक सीमित नहीं होना चाहिए,बल्कि उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण,तार्किक विश्लेषण,मौलिक चिंतन और नैतिक मूल्यों का समावेश भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के शैक्षणिक आयोजन शोधार्थियों को अनुसंधान की बदलती प्रवृत्तियों और आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ.मिनाक्षी राणा ने कार्यक्रम के उद्देश्यों एवं शैक्षणिक रूपरेखा की जानकारी देते हुए प्रतिभागियों को पांच दिवसीय पाठ्यक्रम की गतिविधियों से अवगत कराया। उन्होंने शोधार्थियों को विभिन्न अनुसंधान पद्धतियों,शोधपरक लेखन की बदलती प्रवृत्तियों तथा गुणवत्तापूर्ण शोध कार्य के लिए आवश्यक शैक्षणिक दक्षताओं की जानकारी प्राप्त करने पर विशेष बल दिया। इस अवसर पर आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर प्रो.विनोद मिश्रा ने अपने संबोधन में अकादमिक विमर्श,बौद्धिक सहभागिता और प्रभावी शोधपरक लेखन की महत्ता पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अनुसंधान का वास्तविक उद्देश्य केवल किसी प्रश्न का उत्तर खोजना नहीं,बल्कि सार्थक प्रश्नों को पहचानना और उनका व्यवस्थित,तार्किक एवं प्रमाण आधारित अन्वेषण करना है। उन्होंने शोधार्थियों को अकादमिक लेखन में स्पष्टता,मौलिकता,तार्किकता और विषय की गहन समझ विकसित करने के लिए प्रेरित किया। साथ ही शोध कार्य में निरंतर अध्ययन,गंभीर चिंतन और अनुशासित कार्यशैली को सफलता का आधार बताया। अधिष्ठाता (अनुसंधान एवं परामर्श) प्रो.विवेक श्रीवास्तव ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि शोध एक सतत बौद्धिक प्रक्रिया है,जिसमें जिज्ञासा,प्रश्न करने की क्षमता और व्यवस्थित अन्वेषण का विशेष महत्व है। उन्होंने प्रतिभागियों को इस पांच दिवसीय कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता करने तथा विशेषज्ञों के अनुभवों का अधिकतम लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया। डॉ.धर्मेन्द्र त्रिपाठी ने अंतरविषयक अनुसंधान और विभिन्न विषयों के बीच ज्ञान एवं विचारों के आदान-प्रदान की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के पाठ्यक्रम शोधार्थियों को अलग-अलग शोध दृष्टिकोणों से परिचित कराने के साथ उनके अकादमिक चिंतन को व्यापक बनाने का अवसर प्रदान करते हैं। वहीं कुलसचिव हरि मोल आजाद ने शोध में मौलिकता,सत्यनिष्ठा और नैतिक मूल्यों के महत्व को रेखांकित करते हुए प्रभावी अकादमिक लेखन को शोध की विश्वसनीयता और गुणवत्ता के लिए आवश्यक बताया। इस कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका अंतरविषयक स्वरूप है। इसके अंतर्गत मानविकी,सामाजिक विज्ञान,विज्ञान,अभियांत्रिकी तथा अध्ययन के अन्य क्षेत्रों से जुड़े प्रतिभागियों को एक साझा अकादमिक मंच उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे विभिन्न विषयों के बीच संवाद,विचारों का आदान-प्रदान और शोध संबंधी अनुभवों को साझा करने के नए अवसर विकसित होंगे। कार्यक्रम में केंद्रीय विश्वविद्यालयों,राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों,भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों तथा विभिन्न सरकारी संगठनों और मंत्रालयों से जुड़े प्रतिष्ठित शिक्षाविद्,शोधकर्ता एवं विषय विशेषज्ञ सहभागिता कर रहे हैं। विशेषज्ञों द्वारा अनुसंधान पद्धतियों,शोधपरक लेखन और अकादमिक विमर्श के विभिन्न आयामों पर व्याख्यान दिए जा रहे हैं। इन सत्रों में शोध समस्या की पहचान,अनुसंधान दृष्टिकोण का विकास,उपयुक्त शोध पद्धतियों का चयन,प्रभावी अकादमिक लेखन तथा शोध निष्कर्षों को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की जा रही है। एनआईटी उत्तराखंड की यह पहल उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान संस्कृति विकसित करने,शोधार्थियों को समकालीन अनुसंधान पद्धतियों से जोड़ने तथा अकादमिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पांच दिवसीय यह पाठ्यक्रम प्रतिभागियों को न केवल शोध की तकनीकी बारीकियों से परिचित करा रहा है,बल्कि उनमें स्वतंत्र चिंतन,तार्किक विश्लेषण,मौलिक लेखन और जिम्मेदार शोध की भावना विकसित करने का अवसर भी प्रदान कर रहा है।

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