
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
रुद्रप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। पर्वतीय क्षेत्रों में स्वरोजगार और आय बढ़ाने के उद्देश्य से चलाई जा रही उद्यान विभाग की योजनाओं पर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। जनपद के ऊखीमठ विकासखंड अंतर्गत ग्राम सेनागढ़सारी के किसान मानवेंद्र सिंह नेगी का मामला इस व्यवस्था की पोल खोलता नजर आ रहा है,जहां कागजी नींबू के नाम पर लगाए गए पौधों में वर्षों बाद जंगली जम्बीरी नींबू के फल निकलने से बागवानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। जानकारी के अनुसार मानवेंद्र सिंह नेगी पुत्र पृथ्वीराज ने अगस्त 2020 में उद्यान विभाग की योजना के तहत अपनी लगभग 25 नाली निजी भूमि पर 125 उच्च गुणवत्ता वाले बारामासी कागजी नींबू के पौधों का रोपण किया था। किसान ने पूरी मेहनत,समय और संसाधन लगाकर इन पौधों की देखभाल की। वर्तमान में इनमें से 113 पौधे जीवित हैं और फल भी दे रहे हैं,लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इन सभी पेड़ों पर कागजी नींबू के बजाय जंगली जम्बीरी नींबू के फल लगे हैं। यह मामला केवल एक किसान तक सीमित नहीं है। बताया जा रहा है कि अगस्त-सितंबर 2020 में उद्यान विभाग द्वारा जनपद के करीब 60 किसानों को इसी प्रकार के पौधे वितरित किए गए थे। अब जांच में सामने आया है कि अधिकांश किसानों के खेतों में भी यही स्थिति बनी हुई है। जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग की जांच रिपोर्ट में भी इस बात की पुष्टि हुई है कि किसानों के साथ बड़े स्तर पर धोखाधड़ी हुई है। पीड़ित किसान मानवेंद्र सिंह नेगी ने इस मामले में कई बार उद्यान निदेशालय रानीखेत और जिला उद्यान अधिकारी रुद्रप्रयाग से आर्थिक नुकसान की भरपाई की मांग की है। नियमानुसार ऐसे मामलों में अनुज्ञप्ति प्राधिकारी या नामित समिति द्वारा प्रतिकर तय किया जाना चाहिए,लेकिन तीन वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भी अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है। किसानों का कहना है कि उन्होंने इन पौधों को केवल रोपा ही नहीं,बल्कि उन्हें अपने भविष्य की उम्मीद मानकर दिन-रात मेहनत की। आज जब फल आने का समय आया,तो सच्चाई ने उनके सपनों को तोड़ दिया। यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं,बल्कि किसानों के विश्वास पर किया गया सीधा प्रहार है। सोशल मीडिया के माध्यम से मानवेंद्र सिंह नेगी ने अन्य प्रभावित किसानों से इस अन्याय के खिलाफ एकजुट होने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि आज किसान चुप रहे,तो भविष्य में भी इस प्रकार की लापरवाही और धोखाधड़ी दोहराई जाती रहेगी। अब सवाल यह है कि आखिर किसानों के इस नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा। क्या विभाग समय रहते पीड़ित बागवानों को न्याय और मुआवजा दिला पाएगा,या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। एक बात स्पष्ट है-अब किसान जाग चुका है और अपने हक के लिए आवाज बुलंद करने को तैयार है।