
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। श्रीनगर गढ़वाल के कंसमर्दनी मंदिर मार्ग स्थित मैदान में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के सातवें एवं समापन दिवस पर श्रद्धा,भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का भावपूर्ण वातावरण देखने को मिला। प्रसिद्ध कथावाचक आचार्य शिवप्रसाद ममगांई ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की अनुपम मित्रता,नव योगेश्वरों के आध्यात्मिक ज्ञान तथा राजा जनक के विदेह भाव जैसे महत्वपूर्ण प्रसंगों का विस्तार से वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को जीवन में निःस्वार्थ प्रेम,सत्संग,नाम-स्मरण और निष्काम कर्म अपनाने का संदेश दिया। आचार्य ममगांई ने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं,बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी है। इसके प्रत्येक प्रसंग में मानव जीवन के लिए कोई न कोई गहरा संदेश छिपा है। कृष्ण-सुदामा की मित्रता हमें निस्वार्थ संबंधों का महत्व समझाती है,नव योगेश्वरों का उपदेश आत्मज्ञान और भक्ति का मार्ग दिखाता है,जबकि राजा जनक का जीवन गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी वैराग्य और आत्मिक स्वतंत्रता प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण और उनके परम मित्र सुदामा के प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन करते हुए आचार्य ने कहा कि सुदामा की गरीबी उनके आत्मसम्मान,प्रेम और भक्ति को कभी कमजोर नहीं कर सकी। वे भगवान श्रीकृष्ण के पास अपनी दरिद्रता दूर करने की याचना लेकर नहीं,बल्कि मित्र से मिलने के भाव से पहुंचे थे। उनके पास भेंट के रूप में केवल थोड़े से चावल थे,लेकिन उस छोटी-सी भेंट में प्रेम,श्रद्धा और समर्पण का अथाह भाव समाया हुआ था। आचार्य ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा की भेंट को जिस प्रेम से स्वीकार किया,वह इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर के लिए भौतिक संपत्ति नहीं,बल्कि भक्त का निर्मल हृदय महत्वपूर्ण है। सुदामा ने कुछ मांगा नहीं,लेकिन श्रीकृष्ण ने अपने मित्र की परिस्थितियों को समझते हुए उन्हें सुख-समृद्धि प्रदान की। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में रिश्तों और मित्रता के बीच स्वार्थ,अपेक्षाएं तथा भौतिक लाभ कई बार प्रमुख हो जाते हैं। ऐसे दौर में कृष्ण-सुदामा की मित्रता समाज को प्रेम,विश्वास,त्याग और निस्वार्थ भाव की सीख देती है। सच्चा संबंध वही है,जिसमें व्यक्ति अपने लाभ से पहले दूसरे के सम्मान,सुख और भावनाओं का ध्यान रखे। नव योगेश्वरों के प्रसंग की व्याख्या करते हुए आचार्य शिवप्रसाद ममगांई ने बताया कि राजा जनक के समक्ष नौ योगेश्वरों-कवि,हरि,अंतरिक्ष,प्रबुद्ध,पिप्पलायन,आविर्होत्र,द्रुमिल,चमस और करभाजन-ने आध्यात्मिक ज्ञान तथा भक्ति के विभिन्न पक्षों का विवेचन किया। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य केवल बाहरी आडंबरों तक सीमित रहना नहीं,बल्कि अपने भीतर के विकारों को पहचानकर आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ना है। सच्चा साधक वही है,जो प्रत्येक प्राणी में परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव करे और अपने आचरण में करुणा,प्रेम,विनम्रता तथा सद्भाव को स्थान दे। आचार्य ने कहा कि मनुष्य जीवन केवल भोग-विलास में बिताने के लिए नहीं,बल्कि आत्मज्ञान,सद्कर्म और ईश्वर की प्राप्ति के लिए मिला है। सांसारिक माया-मोह के बीच मन को स्थिर रखना चुनौतीपूर्ण अवश्य है,लेकिन सत्संग,सद्विचार और निरंतर नाम-स्मरण से व्यक्ति अपने जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकता है। उन्होंने अच्छी संगति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य जैसा वातावरण और संगति अपनाता है,उसके विचार तथा आचरण भी उसी के अनुरूप प्रभावित होते हैं। इसलिए जीवन में ऐसी संगति का चुनाव करना चाहिए,जो व्यक्ति को सत्य,धर्म,सदाचार और मानवता के मार्ग पर आगे बढ़ाए। राजा जनक के जीवन प्रसंग की व्याख्या करते हुए आचार्य ने कहा कि राजा जनक राजमहल,राजपाट और सांसारिक जिम्मेदारियों के बीच रहते हुए भी अपने आत्मिक स्वरूप के प्रति जागरूक थे। इसी कारण उन्हें विदेह कहा गया। उनका जीवन यह संदेश देता है कि वैराग्य का अर्थ संसार और परिवार को छोड़ देना मात्र नहीं है,बल्कि संसार में रहते हुए भी मोह,अहंकार और अनावश्यक आसक्ति से मुक्त रहना है। आचार्य ममगांई ने कहा कि गृहस्थ जीवन अपने आप में साधना का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। परिवार और समाज के प्रति अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करते हुए व्यक्ति अपने मन को परमात्मा में लगा सकता है। इसके लिए बाहरी वेशभूषा से अधिक विचारों की पवित्रता,कर्मों की शुद्धता और मन की स्थिरता आवश्यक है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने कर्तव्यों से विमुख हुए बिना निष्काम भाव से कर्म करना चाहिए। जब कर्म में ईमानदारी,व्यवहार में विनम्रता और मन में ईश्वर के प्रति समर्पण होता है,तब सामान्य जीवन भी साधना का स्वरूप धारण कर लेता है। समापन दिवस पर तीनों प्रसंगों का सार प्रस्तुत करते हुए आचार्य शिवप्रसाद ममगांई ने कहा कि सुदामा से निस्वार्थ मित्रता और समर्पण की सीख मिलती है,नव योगेश्वरों से आत्मज्ञान,भक्ति और सत्संग का महत्व समझ में आता है,जबकि राजा जनक का जीवन गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए भी वैराग्यपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि श्रीमद्भागवत कथा में सुने गए आध्यात्मिक संदेशों को केवल कथा स्थल तक सीमित न रखें,बल्कि उन्हें अपने दैनिक जीवन,पारिवारिक संबंधों और सामाजिक व्यवहार में भी उतारें। दूसरों के प्रति प्रेम,जरूरतमंदों की सहायता,अहंकार का त्याग,सत्य का पालन और ईश्वर का स्मरण ही धर्म के वास्तविक स्वरूप को जीवन में स्थापित करते हैं। कथा के सातवें दिन इन प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति,ज्ञान,वैराग्य और मानवीय मूल्यों का संदेश मिला। आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण को भक्तिमय बनाए रखा। इस अवसर पर पूर्व जिला पंचायत सदस्य राजेश्वरी जोशी,ग्राम प्रधान मनोज जोशी,व्यापार मंडल अध्यक्ष अनुज जोशी,अध्यापक वीरेंद्र राणा,आचार्य सर्वेश्वर प्रसाद भट्ट,कविता जोशी,सपना जोशी,सुबोध काला,ऊषा काला,उर्मिला काला,एकादशी पाण्डेय,प्रेमा,शकुंतला थपलियाल,वंदना,अक्षत,अंशुमान,अनिका,आचार्य महेश भट्ट,बृजेश भट्ट,ऋषि सेमवाल,शुभम रागंड सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।