
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी/नरेन्द्र सिंह
कीर्तिनगर/श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत,लोक आस्था और वीर परंपरा का जीवंत संगम वीर शिरोमणि माधो सिंह भण्डारी स्मृति विकास मेला मलेथा के तृतीय दिवस पर देखने को मिला। लोकगीतों की मिठास,कीर्तन मंडलियों की आध्यात्मिक गूंज और दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट ने पूरे मेला परिसर को उत्सवमय बना दिया। मेले के तृतीय दिवस का शुभारंभ देवप्रयाग विधायक विनोद कंडारी ने मुख्य अतिथि के रूप में दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि ऐसे मेले न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान को जीवंत रखते हैं,बल्कि नई पीढ़ी को लोक परंपराओं से जोड़ने का भी सशक्त माध्यम हैं। कार्यक्रम में सत्य विजय स्टोन क्रेशर मलेथा के रेपाल बिष्ट एवं जितेंद्र मोहन सजवान विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने मेले के आयोजन की सराहना करते हुए इसे सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बताया। इस अवसर पर क्षेत्रीय विधायक विनोद कंडारी ने मेले में शानदार प्रस्तुतियां देने वाली नागराजा,सरस्वती,ज्वालपा,सूर्यदेवी,राजराजेश्वरी,शिवाय और नागेला कीर्तन मंडलियों को सम्मानित कर उनके योगदान की प्रशंसा की। कीर्तन मंडलियों की भक्तिमय प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया। लोकगीतों पर थिरके दर्शक,गूंज उठी गढ़वाली माटी मेले की सांस्कृतिक संध्या में लोक गायक किशन महिपाल आकर्षण का केंद्र रहे। उनके साथ युवा गायिका साक्षी ने मेरी मां ज्वालपा भजन एवं दादू अब किले नी दिखेंदु गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं की भावनाओं को छू लिया। इसके बाद जैसे ही किशन महिपाल ने अपने लोकप्रिय गढ़वाली गीत जिया कोरी-कोरी खांदू,रानीखेत रामढोला,किंगारी का डाला घुगुती सहित अन्य लोकगीतों की प्रस्तुति दी,दर्शक खुद को थिरकने से रोक नहीं पाए। तालियों की गूंज और लोकधुनों की मिठास ने मलेथा की रात को यादगार बना दिया। किशन महिपाल की गायकी में गढ़वाल की मिट्टी की खुशबू,पहाड़ का दर्द और उत्सव-तीनों का सुंदर समन्वय दिखाई दिया। उनके गीतों ने यह साबित कर दिया कि गढ़वाली लोकसंगीत आज भी समाज की आत्मा में बसता है। वीर शिरोमणि माधो सिंह भण्डारी स्मृति विकास मेला न केवल एक सांस्कृतिक आयोजन है,बल्कि यह गढ़वाली पहचान,लोककला और सामाजिक एकजुटता का उत्सव बनकर उभर रहा है,जहां परंपरा और आधुनिकता एक साथ कदमताल करती नजर आती हैं।