गढ़वाल संस्कृति और भावनाओं की जीवंत झलक-पित्रों की थाती बनी चर्चाओं का केंद्र

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। गढ़वाल की लोकभाषा संस्कृति और पहाड़ की संवेदनाओं को सशक्त रूप में प्रस्तुत करती गढ़वाली फिल्म पित्रों की थाती इन दिनों दर्शकों के बीच खूब सराही जा

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। गढ़वाल की लोकभाषा संस्कृति और पहाड़ की संवेदनाओं को सशक्त रूप में प्रस्तुत करती गढ़वाली फिल्म पित्रों की थाती इन दिनों दर्शकों के बीच खूब सराही जा रही है। उत्तराखंड के सिनेमाघरों और विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों में प्रदर्शित यह फिल्म न केवल मनोरंजन का माध्यम बनी है,बल्कि पहाड़ के सामाजिक,आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्नों को भी गहराई से उठाती है। पलायन और भू-कानून जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सशक्त संदेश फिल्म पित्रों की थाती की मूल आत्मा उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या पलायन पर केंद्रित है। निर्देशक ने बड़ी संवेदनशीलता के साथ यह दिखाने का प्रयास किया है कि कैसे रोजगार,शिक्षा और सुविधाओं के अभाव में लोग अपनी पुश्तैनी जमीनों को छोड़ने पर मजबूर हैं। साथ ही,भू-कानून पर भी फिल्म ने समाज को जागरूक करने का प्रयास किया है,यह बताते हुए कि अपनी थाती अपनी जमीन और संस्कृति की रक्षा करना हर पहाड़ी की जिम्मेदारी है। गीत-संगीत ने बढ़ाया लोकसंवेदना का आकर्षण
फिल्म के गीतों ने लोगों के दिलों को छू लिया है। इसका भावपूर्ण गीत शांति राणा द्वारा लिखा गया है,जबकि प्रसिद्ध लोकगायक राकेश टम्टा ने अपने सुमधुर स्वर और संगीत से इसे अमर बना दिया है। गीत की सादगी और संवेदना में गढ़वाली लोक-संस्कृति की आत्मा झलकती है। स्थानीय कलाकारों का सशक्त अभिनय,यथार्थ के करीब प्रस्तुति फिल्म में स्थानीय कलाकारों ने अपने सहज और प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया है। उनके संवाद उच्चारण और भाव-प्रदर्शन ने दर्शकों को अपने गांव-घरों की याद दिला दी। हर दृश्य में पहाड़ की मिट्टी,बोली और भावनाओं की सुगंध महसूस की जा सकती है। गढ़वाली सिनेमा को नई दिशा देती टीम फिल्म की परिकल्पना प्रसिद्ध निर्देशक मदन गडोई की रही है,जिन्होंने गढ़वाली सिनेमा को नई सोच दी है। फिल्म के निर्माता-निर्देशक एवं संपादक हैं सतीश राणा जो आर.डी.फिल्म जयहरीखाल के संस्थापक भी हैं। पटकथा लेखन का दायित्व आयुष नेगी ने बखूबी निभाया है,जिनकी लेखनी ने कहानी में गहराई और यथार्थ का संगम जोड़ा है। गढ़वाली सिनेमा के पुनर्जागरण की दिशा में एक कदम पित्रों की थाती केवल एक फिल्म नहीं,बल्कि यह गढ़वाली पहचान और जड़ों से जुड़ाव का भावनात्मक दस्तावेज है। यह फिल्म यह संदेश देती है कि आधुनिकता के दौर में भी अपनी भाषा,संस्कृति और परंपराओं को सहेजना उतना ही आवश्यक है जितना सांस लेना। दर्शक इसे दिल से बनी फिल्म कहकर सराह रहे हैं। ग्रामीण परिवेश,प्राकृतिक सौंदर्य और लोकसंवेदना का संगम इस फिल्म को उत्तराखंड सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान दिला रहा है।

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