
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। सरस्वती शिशु मंदिर श्रीनगर में बुधवार को श्रीमद्भ भागवत गीता जयंती अत्यंत श्रद्धा,उत्साह और आध्यात्मिक माहौल में मनाई गई। विद्यालय परिसर दिनभर गीता के दिव्य संदेशों से गुंजायमान रहा। इस पावन अवसर पर गीता पाठ एवं गीता श्लोक वाचन प्रतियोगिता का भव्य आयोजन किया गया,जिसमें विद्यार्थियों ने अद्भुत प्रतिभा और आध्यात्मिक समझ का परिचय दिया। कार्यक्रम के तहत प्रतियोगिता दो चरणों में आयोजित की गई। पहले चरण में कक्षा स्तर पर नन्हे प्रतिभागियों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला। जजों ने प्रथम,द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों का चयन किया। दूसरे चरण-जो कि विद्यालय स्तर का मुख्य चरण था। चयनित प्रतिभागियों ने मंच पर आकर गीता के श्लोकों का जो आत्मीय और प्रभावशाली वाचन किया,उसने उपस्थित सभी गुरुजनों और अभिभावकों की वाहवाही लूट ली। मुख्य प्रतियोगिता में कक्षा पंचम की आराध्या पंवार ने प्रथम स्थान प्राप्त कर विद्यालय का नाम रोशन किया। कक्षा चतुर्थ की वंदना द्वितीय स्थान पर रहीं,जबकि कक्षा द्वितीय की नन्ही प्रतिभा कृतिका ने तृतीय स्थान अर्जित किया। कार्यक्रम की सबसे विशेष झलक रही कक्षा प्रथम के छोटे-छोटे भैया-बहनों द्वारा श्रीमद्भ भगवद्गीता के अध्याय 12-भक्ति योग का पूर्ण कंठस्थ पाठ। नन्हे भैया वेदांत जोशी,अध्ययन चमोली और बहन अक्षिता बलोनी ने संपूर्ण 12 वां अध्याय बिना रुके,शुद्ध उच्चारण के साथ सुनाया,जिसे सुनकर पूरा विद्यालय गर्व से भर उठा और हॉल तालियों से गूंज उठा। कार्यक्रम में प्रधानाचार्य गोविंद सिंह सहित वरिष्ठ आचार्य ओमप्रकाश उपाध्याय,योगेंद्र सिंह रमोला,शिशुपाल सिंह भंडारी,गजपाल सिंह,कपिल पाल,किरण पंवार,चंद्रेश्वरी सेमवाल,रेखा मलासी,शिवानी गैरोला,अर्चना गैरोला,उपेंद्र सेमवाल व ऊषा बिष्ट सहित अनेक अभिभावक उपस्थित रहे। प्रधानाचार्य गोविंद सिंह ने गीता जयंती के अवसर पर विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा गीता वह दिव्य ज्ञान है,जिसने अर्जुन को मोह और भ्रम से मुक्त किया। वही ज्ञान आज हर व्यक्ति के जीवन का मार्गदर्शन बन सकता है। यदि गीता का संदेश जीवन में उतार लिया जाए,तो जीवन के हर संकट का समाधान संभव है। गीता जयंती पर आयोजित यह कार्यक्रम न केवल एक प्रतियोगिता रहा,बल्कि बच्चों में आध्यात्मिक मूल्यों,भारतीय संस्कृति और गीता के महान संदेशों को रोपित करने का एक सार्थक प्रयास भी साबित हुआ। विद्यालय परिवार द्वारा ऐसे आयोजनों से शिक्षा के साथ संस्कारों के समन्वय की मिसाल पेश की जा रही है।