हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। गोवंश का संरक्षण केवल कानून का पालन करने तक सीमित नहीं,बल्कि हमारी सामाजिक,नैतिक और मानवीय जिम्मेदारी भी है। सड़कों पर बेसहारा घूमते गोवंश को सुरक्षित आश्रय,समय पर उपचार और पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराना समाज के प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। इसी उद्देश्य से आमजन से उत्तराखण्ड गोवंश संरक्षण अधिनियम 2007 एवं उससे संबंधित संशोधित प्रावधानों का पालन करने और गोवंश को आवारा छोड़ने से बचने की अपील की गई है। गोवंश संरक्षण के लिए प्रदेश में लागू कानूनी प्रावधानों के तहत गोवंश के वध,गोमांस रखने और उसके परिवहन सहित प्रतिबंधित गतिविधियों पर रोक लगाने के प्रावधान हैं। वहीं गोवंश को लावारिस छोड़ने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना भी आवश्यक है। नियमों का उल्लंघन करने पर कानून के अनुसार दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। ऐसे में पशुपालकों को चाहिए कि वे अपने पशुओं की उचित देखभाल करें और किसी भी परिस्थिति में उन्हें सड़कों पर बेसहारा न छोड़ें। गोवंश की पहचान और संरक्षण व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए पंजीकरण तथा ईयर टैगिंग महत्वपूर्ण है। उत्तराखण्ड गोवंश संरक्षण (संशोधन) अधिनियम 2015 के प्रावधानों के अनुसार शहरी क्षेत्रों में गोवंश पालन के लिए संबंधित राजकीय पशु चिकित्सालय में नियुक्त पशु चिकित्सा अधिकारी से पंजीकरण प्रमाण पत्र प्राप्त करना आवश्यक बताया गया है। इसके साथ ही प्रत्येक गोवंश की पहचान सुनिश्चित करने के लिए उसके कान में ईयर टैग लगवाना भी जरूरी है। पशुपालकों को चाहिए कि वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपने गोवंश का पंजीकरण कराएं तथा ईयर टैगिंग सुनिश्चित करें,जिससे पशुओं की पहचान और उनकी निगरानी में सहायता मिल सके। सड़कों पर घूमते गोवंश के कारण कई बार दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। वहीं दुर्घटना में घायल अथवा बीमार पशुओं को समय पर उपचार नहीं मिलने से उनकी स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसे में आमजन से अपील की गई है कि सड़क पर कोई गोवंश घायल,बीमार या असहाय अवस्था में दिखाई दे तो तत्काल निकटतम पशु चिकित्सालय अथवा उत्तराखण्ड गो सेवा आयोग को सूचना दें,ताकि आवश्यक उपचार और देखभाल की व्यवस्था की जा सके। गौशालाओं को सहयोग भी है गोसेवा का महत्वपूर्ण माध्यम
गोवंश संरक्षण में जनभागीदारी को बढ़ावा देने के लिए नागरिक अपने आसपास संचालित गौशालाओं और गोसदनों में संरक्षित पशुओं के लिए हरा चारा,दाना तथा अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध करा सकते हैं। इसके अतिरिक्त जरूरतमंद पशुओं की देखभाल और उनके उपचार में सहयोग देकर भी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई जा सकती है। गोवंश संरक्षण तभी प्रभावी होगा,जब कानून के पालन के साथ समाज भी अपनी जिम्मेदारी समझेगा। पशुपालकों की सजगता,प्रशासन की सक्रियता और आमजन के सहयोग से गोवंश को सड़कों पर बेसहारा छोड़ने की समस्या को कम किया जा सकता है। जरूरत है कि गोसेवा को केवल धार्मिक आस्था तक सीमित न रखकर उसे संवेदनशीलता,जिम्मेदारी और मानवीय व्यवहार से जोड़ा जाए।