दिल्ली में सजी देवभूमि की साहित्यिक धरोहर-रमेश चन्द्र जोशी को साहित्य सम्मान, बहुभाषी संगोष्ठी में गूंजा संस्कृति-सृजन का स्वर

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी नई दिल्ली/श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध भाषा,संस्कृति और साहित्य को समर्पित एक भव्य एवं गरिमामयी आयोजन में राजधानी दिल्ली स्थित गढ़वाल भवन बहुभाषी साहित्यिक चेतना के अद्भुत संगम

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

नई दिल्ली/श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध भाषा,संस्कृति और साहित्य को समर्पित एक भव्य एवं गरिमामयी आयोजन में राजधानी दिल्ली स्थित गढ़वाल भवन बहुभाषी साहित्यिक चेतना के अद्भुत संगम का साक्षी बना। लोकपर्व फूलदेई के पावन अवसर पर रविवार 15 मार्च 2026 को आयोजित मासिक साहित्यिक संगोष्ठी ने न केवल साहित्य प्रेमियों को एक मंच पर जोड़ा,बल्कि देवभूमि की सांस्कृतिक आत्मा को भी सजीव कर दिया। इस अवसर पर जौनसार क्षेत्र के वरिष्ठ साहित्यकार,प्रख्यात चिंतक एवं जौनसारी भाषा के सजग संरक्षक रमेश चन्द जोशी को प्रतिष्ठित साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके दीर्घकालिक साहित्यिक योगदान,शोधपरक कार्यों और जौनसारी भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन में निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका का प्रतीक रहा। इससे पूर्व दिसंबर में कमल रावत,जनवरी में डॉ.कुसुम भट्ट तथा फरवरी में कृपाल सिंह शीला को भी सम्मानित किया जा चुका है। कार्यक्रम का शुभारंभ गढ़वाल भवन परिसर में स्थापित पवित्र श्रीलगुलि (मनीप्लांट) के सान्निध्य में प्रदीप सिंह रावत खुदेड़ के नवसृजित गीत फूलदेई क्षमा देई से हुआ,जिसने वातावरण को सांस्कृतिक भावनाओं से ओतप्रोत कर दिया और उपस्थित जनसमूह को अपनी जड़ों से जोड़ दिया। हजार ग्राम-हजार धाम की अवधारणा ने छुआ मन संगोष्ठी के प्रथम सत्र में पजल यात्राओं के सूत्रधार जगमोहन सिंह रावत जगमोरा ने फरवरी में सम्पन्न सातवीं अष्टधाम पजल यात्रा (नौड़ी-पौड़ी,राठ क्षेत्र) का जीवंत संस्मरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हजार ग्राम-हजार धाम केवल एक विचार नहीं बल्कि उत्तराखंड की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करने का एक व्यापक अभियान है। मई 2025 से प्रारंभ हुई इन यात्राओं के माध्यम से अब तक 56 धामों का भ्रमण किया जा चुका है। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि ऐसे आयोजन भाषा और संस्कृति के संरक्षण के साथ-साथ गांव और शहर के बीच की वैचारिक दूरी को भी कम करने का कार्य कर रहे हैं। धार्मिक पर्यटन,भाषा मानकीकरण और आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी यह पहल सार्थक साबित हो रही है। साहित्यिक विमर्श,गीत और समीक्षा से सजी संध्या द्वितीय सत्र में गिरधारी सिंह रावत के गीतिकाव्य संग्रह गीत जु लिख्यां छन पर गहन समीक्षा प्रस्तुत की गई। रोशन लाल हिंद कवि के मधुर गायन और प्रो.हरेंद्र सिंह असवाल की विद्वत्तापूर्ण व्याख्या ने श्रोताओं को साहित्यिक ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया। निर्मला नेगी ने संगोष्ठी को नवोदित रचनाकारों की प्रयोगशाला बताते हुए इसे भविष्य के साहित्यिक विश्वविद्यालय की दिशा में अग्रसर प्रयास कहा। वहीं संदीप गढ़वाली घनशाला ने वरिष्ठ साहित्यकारों की कृतियों की टैगलाइन्स प्रस्तुत कर संगोष्ठी को एक नई दृष्टि दी। संगोष्ठी के तीसरे चरण में रमेश चन्द जोशी (आईआईएस सेवानिवृत्त) को साहित्य सम्मान प्रदान किया गया। वर्तमान में वे केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के मीडिया सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं। जौनसारी भाषा के पहले प्रामाणिक शब्दकोश,व्याकरण एवं साहित्यिक कृतियों के माध्यम से उन्होंने क्षेत्रीय भाषा को नई पहचान दिलाई है। उनकी प्रशस्ति जौनसारी और गढ़वाली दोनों भाषाओं में पढ़ी गई,जो इस आयोजन की बहुभाषिक समरसता का सशक्त प्रतीक बनी। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष सत्र में मातृशक्ति की गरिमामयी उपस्थिति रही। सीमा नेगी,निधि उनियाल,कुसुम चौहान,संगीता शर्मा सहित अनेक महिला रचनाकारों ने काव्यपाठ के माध्यम से महिला सशक्तिकरण के विविध आयाम प्रस्तुत किए। महिलाओं द्वारा निर्मित पहाड़ी उत्पादों के विपणन को बढ़ावा देने का प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पारित किया गया। कार्यक्रम के दौरान सुरेंद्र सिंह रावत लाटा की पुस्तक पता नहीं क्यों का विमोचन भी किया गया,जिसे जन-सरोकारों से जुड़ा और प्रभावशाली साहित्यिक प्रयास बताया गया। लोकगीतों और काव्यपाठ से जीवंत हुआ माहौल अंतिम चरण में हुए काव्यपाठ और लोकगीतों ने संगोष्ठी को जीवंत बना दिया। श्रोताओं ने गीतों पर झूमते हुए देवभूमि की सांस्कृतिक आत्मा को आत्मसात किया। लगभग 60 से अधिक साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति में सम्पन्न यह आयोजन एक सशक्त सांस्कृतिक मंच बनकर उभरा। गढ़खालेश्वर महादेव के महंत नरेश भारती ने इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा देवभूमि की वाणी में बसती संस्कृति की शान,साहित्य साधना से जगमग हो उत्तराखंड की पहचान। शब्दों में जब जागे जन-मन का पावन विश्वास,तभी सृजन बनता है समाज का उज्ज्वल प्रकाश। अंत में यह स्पष्ट हुआ कि जब साहित्य,संस्कृति और समाज एक सूत्र में बंधते हैं,तब एक नई चेतना का जन्म होता है। यही चेतना उत्तराखंड की असली पहचान है,जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का कार्य करती रहेगी।

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