

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड जिसे विश्व में देवभूमि के नाम से जाना जाता है,अपनी आध्यात्मिक महिमा,हिमालयी सौंदर्य और सैकड़ों वर्षों पुरानी जलसंस्कृति के लिए विशेष पहचान रखता है। यहां के गांवों में आज भी बहते प्राकृतिक जलस्रोत-झरने,नौले,धारे और जलकुंड-हजारों परिवारों की जीवनरेखा बने हुए हैं। आधुनिक पेयजल योजनाओं के बावजूद इन स्रोतों का महत्व कम नहीं हुआ है,क्योंकि यह केवल जल का साधन नहीं,बल्कि पहाड़ी संस्कृति,स्वास्थ्य और जीवनशैली का आधार हैं। हिमालय की चट्टानों से छनकर आने वाला यह जल औषधीय गुणों से भरपूर है। कैल्शियम,मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे खनिज इसकी गुणवत्ता को और बढ़ाते हैं। यही कारण है कि आज भी बुजुर्ग कहते हैं-नौले का पानी,दवा का काम करे। यह जल शरीर को शुद्धता,मजबूती और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है। परंपरा और प्रकृति का अद्भुत संगम-गांवों में सुबह-सुबह महिलाएं और बच्चे जब जलकुंडों से पानी भरते हैं,तो यह केवल दैनिक कार्य नहीं,बल्कि प्रकृति से आत्मीय जुड़ाव की निशानी है। कई गांवों में इन नौलों और धाराओं की पूजा की जाती है,क्योंकि इन्हें जीवनदायिनी शक्ति माना जाता है। जलवायु परिवर्तन,अनियमित वर्षा,भू-स्खलन,अतिक्रमण और जलग्रहण क्षेत्रों में कटान के कारण कई नौले-धारे सूख चुके हैं। कुछ लुप्त होने की कगार पर हैं। यह न केवल पर्यावरणीय संकट है,बल्कि पहाड़ी परंपराओं के टूटने का संकेत भी है। कई गांवों में युवाओं ने सफाई अभियान,पौधारोपण और स्रोत संरक्षण के प्रयासों से लुप्त हुए झरनों को फिर से बहा दिया है। इन प्रयासों ने साबित किया है कि सामूहिक संकल्प से प्रकृति फिर जीवंत हो सकती है। विशेषज्ञों व ग्रामीणों की मांग है कि सरकार-लुप्त जलस्रोतों की वैज्ञानिक तरीके से पहचान करे। संरक्षण व पुनर्जीवन के लिए पारंपरिक-वैज्ञानिक तकनीक अपनाए। हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों को विशेष सुरक्षा दे। गांवों को आर्थिक,तकनीकी और संसाधनात्मक सहयोग प्रदान करे। स्कूलों और पंचायत स्तर पर नौला-धारा संरक्षण को जनआंदोलन के रूप में विकसित करे। भविष्य के लिए जरूरी संकल्प-जल स्रोत बचाओ अभियान को गति,इन प्राकृतिक जलधाराओं को बचाने के लिए जनमानस में जागरूकता जरूरी है। खबर में नीचे जोड़ी जा रही प्रेरक पंक्तियां इस अभियान को जन-आंदोलन का रूप दे सकती हैं-जल स्रोत बचाओ-नौले-धारे बचेंगे तो ही पहाड़ बचेगा और पहाड़ बचेगा तो जीवन बचेगा। जल है तो कल है-और पहाड़ का जल है तो अमृतमय कल है। एक पौधा,एक प्रयास-सूखे स्रोतों में फिर लौटे विश्वास। जहां जल बहता है,वहां जीवन बसता है-इस जीवन को सूखने न दें। प्रकृति ने दिया है अमृतधारा का उपहार,इसका संरक्षण करना हमारा संस्कार। अंत में उत्तराखंड के गांवों की असली पहचान इन बहते झरनों और नौलों में बसती है। यदि आज संरक्षण नहीं किया गया,तो आने वाली पीढ़ियां इस शुद्ध जल और उसकी संस्कृति से वंचित हो जाएंगी। जहां नौला बहे,वहां जीवन रहे,जहां झरने बहें,वहां संस्कृति फले-फूले। इन्हें बचाना हमारा कर्तव्य ही नहीं,भविष्य की पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी भी है।