हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों को उच्च शिक्षा व्यवस्था में प्रभावी ढंग से लागू करने,शिक्षकों की शैक्षणिक दक्षता बढ़ाने तथा विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ व्यावहारिक कौशल से जोड़ने की दिशा में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र तथा मानव रचना अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान एवं अध्ययन संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर अभिमुखीकरण एवं संवेदीकरण कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के 96 प्रतिभागियों ने सहभागिता की। इस संकाय विकास कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों एवं शोधार्थियों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के मूल उद्देश्यों,प्रमुख प्रावधानों,नवीन शैक्षणिक दृष्टिकोणों तथा उनके प्रभावी क्रियान्वयन की प्रक्रिया से परिचित कराना है। कार्यक्रम के माध्यम से इस बात पर विशेष बल दिया जा रहा है कि उच्च शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहे,बल्कि विद्यार्थियों में व्यावहारिक दक्षता,रोजगारपरक कौशल,नवाचार,बहुविषयक समझ तथा सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का भी विकास करे। कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में मानव रचना अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान एवं अध्ययन संस्थान के कुलपति प्रो.संजय श्रीवास्तव हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र के निदेशक प्रो.देवेंद्र सिंह नेगी,संकाय विकास कार्यक्रम की अधिष्ठाता प्रो.नंदिनी श्रीवास्तव,केंद्र के डॉ.सोमेश थपलियाल एवं डॉ.अमरजीत सिंह परिहार,मानव रचना विश्वविद्यालय के उपनिदेशक एवं कार्यक्रम समन्वयक डॉ.संजय कुमार तथा पाठ्यक्रम समन्वयक प्रो. प्रियंका सिंह उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों के स्वागत एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। इसके पश्चात प्रो.प्रियंका सिंह ने कार्यक्रम की रूपरेखा,उद्देश्यों तथा अपेक्षित परिणामों की जानकारी देते हुए बताया कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम शिक्षकों को बदलती शैक्षणिक आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्वागत संबोधन में प्रो.देवेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था को अधिक बहुआयामी,विद्यार्थी-केंद्रित,कौशल आधारित तथा रोजगारोन्मुख बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी पहल है। इस नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान प्रदान करना नहीं,बल्कि उन्हें जीवन की वास्तविक चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक क्षमताओं से भी सुसज्जित करना है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र का प्रमुख उद्देश्य शिक्षकों की शैक्षणिक दक्षता,व्यावसायिक क्षमता और शिक्षण संबंधी कौशल को विकसित करना है। प्रशिक्षित एवं दक्ष शिक्षक ही नई शिक्षा नीति की मूल भावना को कक्षाओं तक पहुंचाकर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में प्रभावी योगदान दे सकते हैं। उन्होंने शिक्षकों से आह्वान किया कि वे शिक्षण की पारंपरिक पद्धतियों के साथ आधुनिक शैक्षणिक दृष्टिकोणों का समन्वय स्थापित करें और विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने,चिंतन करने,नए विचार विकसित करने तथा व्यावहारिक अनुभवों से सीखने के अवसर प्रदान करें। मानव रचना अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान एवं अध्ययन संस्थान के कुलपति प्रो.संजय श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में बहुविषयक शिक्षा,विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षण और परिणामोन्मुख शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ऐसे में शिक्षकों को भी अपनी शिक्षण पद्धतियों में निरंतर सुधार करते हुए नवीन विचारों और प्रभावी तकनीकों को अपनाना होगा। उन्होंने प्रतिभागियों से कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग लेने तथा प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त ज्ञान एवं अनुभवों को अपने शिक्षण और शोध कार्यों में उपयोग करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए आवश्यक है कि विद्यार्थी विभिन्न विषयों के बीच संबंधों को समझें और अपने ज्ञान का उपयोग वास्तविक परिस्थितियों में कर सकें। इस अवसर पर डॉ.सोमेश थपलियाल ने प्रतिभागियों को कार्यक्रम की समय-सारणी,उपस्थिति,मूल्यांकन,प्रतिपुष्टि तथा प्रमाणपत्र प्राप्त करने से संबंधित दिशा-निर्देशों की जानकारी दी। उद्घाटन सत्र के अंत में डॉ.संजय कुमार ने सभी अतिथियों,आयोजकों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के प्रथम तकनीकी सत्र में राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान नई दिल्ली के विशेषज्ञ प्रो.कुमार सुरेश ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के संदर्भ में कौशल शिक्षा की प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि पिछले तीन-चार वर्षों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के लिए विभिन्न दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य कौशल आधारित शिक्षा को उच्च शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना है,ताकि विद्यार्थी अपनी शैक्षणिक योग्यता के साथ व्यावहारिक दक्षता भी हासिल कर सकें। प्रो.कुमार सुरेश ने कहा कि परंपरागत रूप से व्यावसायिक शिक्षा,औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों और सामान्य उच्च शिक्षा को अलग-अलग धाराओं में देखा जाता रहा है। इस विभाजन के कारण कौशल आधारित शिक्षा को वह महत्व नहीं मिल पाया,जिसकी वर्तमान समय में आवश्यकता है। बदलते आर्थिक एवं सामाजिक परिवेश में इस अंतर को समाप्त करना और शिक्षा को रोजगार की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सामान्य शिक्षा और कौशल शिक्षा एक-दूसरे की पूरक हैं। जब विद्यार्थियों को विषयगत ज्ञान के साथ तकनीकी दक्षता,व्यावहारिक प्रशिक्षण,समस्या समाधान और नवाचार के अवसर मिलते हैं,तब वे रोजगार प्राप्त करने के साथ स्वरोजगार और उद्यमिता के क्षेत्र में भी आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 शिक्षा को अधिक उपयोगी,समावेशी और जीवनोपयोगी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके लिए शिक्षण संस्थानों को उद्योगों,स्थानीय आवश्यकताओं और रोजगार के बदलते स्वरूप के साथ बेहतर तालमेल स्थापित करना होगा। कार्यक्रम के द्वितीय तकनीकी सत्र में प्रो.संदीप कुलश्रेष्ठ ने अंतरपीढ़ीगत संबंधों,भाषा तथा ज्ञान के हस्तांतरण के सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान का हस्तांतरण केवल पारिवारिक परंपरा नहीं,बल्कि समाज की सांस्कृतिक निरंतरता और सामूहिक पहचान को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने बताया कि अंतरपीढ़ीगत संबंध केवल परिवार के वरिष्ठ और युवा सदस्यों के बीच भावनात्मक जुड़ाव तक सीमित नहीं हैं। इनके माध्यम से जीवन के अनुभव,नैतिक मूल्य,भाषा,लोकपरंपराएं,सामाजिक व्यवहार और सांस्कृतिक विरासत नई पीढ़ी तक पहुंचती है। परिवार एवं समाज में विभिन्न पीढ़ियों के बीच संवाद और परस्पर सम्मान की भावना जितनी मजबूत होगी,ज्ञान और परंपराओं की निरंतरता भी उतनी ही बेहतर बनी रहेगी। प्रो.कुलश्रेष्ठ ने भाषा के महत्व पर विशेष जोर देते हुए कहा कि भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं,बल्कि संस्कृति,ज्ञान,परंपरा और सामाजिक पहचान की संवाहक भी है। मातृभाषा एवं भारतीय भाषाओं के माध्यम से बच्चों और युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों,स्थानीय ज्ञान तथा पूर्वजों के अनुभवों से जोड़ना अधिक सहज हो सकता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय भाषाओं,बहुभाषिकता और भारतीय ज्ञान परंपरा को प्रोत्साहित करती है। इस दृष्टि से लोककथाओं,लोकगीतों,पारंपरिक ज्ञान,स्थानीय इतिहास और बुजुर्गों के जीवनानुभवों को संकलित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। प्रो.संदीप कुलश्रेष्ठ ने आधुनिक जीवनशैली,रोजगार के लिए पलायन,एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति तथा डिजिटल माध्यमों पर बढ़ती निर्भरता के कारण विभिन्न पीढ़ियों के बीच प्रत्यक्ष संवाद में आ रही कमी पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों में परिवारों,शैक्षणिक संस्थानों और समुदायों को मिलकर संवाद एवं सहयोग की संस्कृति विकसित करनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ज्ञान का हस्तांतरण एकतरफा प्रक्रिया नहीं है। वरिष्ठ पीढ़ी अपने अनुभव,जीवन-मूल्य,पारंपरिक ज्ञान और सामाजिक व्यवहार से युवाओं को दिशा देती है,जबकि युवा पीढ़ी तकनीक,नवाचार और बदलते परिवेश की नई जानकारियों के माध्यम से वरिष्ठों को सहयोग प्रदान कर सकती है। इस प्रकार दोनों पीढ़ियां एक-दूसरे से सीखते हुए समाज के समग्र विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तकों और परीक्षाओं तक सीमित रखने के बजाय उसे जीवनानुभव,भाषा,संस्कृति,नैतिक मूल्यों और व्यावहारिक ज्ञान से जोड़ना चाहिए। इससे विद्यार्थियों में न केवल विषयगत समझ विकसित होगी,बल्कि उनमें सामाजिक उत्तरदायित्व,संवेदनशीलता और अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान की भावना भी मजबूत होगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर आयोजित यह अभिमुखीकरण एवं संवेदीकरण कार्यक्रम शिक्षकों और शोधार्थियों को शिक्षा के बदलते स्वरूप,कौशल आधारित शिक्षण,भारतीय भाषाओं,सांस्कृतिक विरासत तथा ज्ञान के अंतरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श का अवसर प्रदान कर रहा है। कार्यक्रम का व्यापक उद्देश्य शिक्षकों को नई शिक्षा नीति की मूल भावना से जोड़ते हुए उच्च शिक्षा में गुणवत्तापूर्ण,व्यावहारिक और विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षण को प्रोत्साहित करना है। इसके साथ ही शिक्षा और रोजगार के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने,भारतीय ज्ञान परंपरा को महत्व देने तथा विभिन्न पीढ़ियों के अनुभवों को शैक्षणिक प्रक्रिया से जोड़ने की संभावनाओं पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। गढ़वाल विश्वविद्यालय और मानव रचना अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान एवं अध्ययन संस्थान की यह संयुक्त पहल शिक्षक प्रशिक्षण,शैक्षणिक नवाचार और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। ऐसे कार्यक्रमों से शिक्षकों की क्षमताओं को विकसित करने के साथ उच्च शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी,कौशलपरक और समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने में सहायता मिलने की अपेक्षा है।