
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। विश्व पर्यटन में शून्य काल सिद्धांत और पर्यटन विषय विशेषज्ञता में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) और विश्व पर्यटन संगठन (WTO) से संपर्क करने वाले पहले भारतीय पर्यटन विज्ञानी डॉ.शंकर काला गढ़वाल विश्वविद्यालय से हैं। नये-पर्यटन और तीर्थयात्रा में किए गए उनके शोध प्रबंध के विचारों पर आधारित उनकी पुस्तक गढ़वाल विश्वविद्यालय सहित देश के कई पुस्तकालयों में उपलब्ध है और यह एक प्रमुख संदर्भ स्रोत भी है। इस पुस्तक को उत्तराखंड सरकार द्वारा प्रदत्त परियोजना में सूचीबद्ध किया जाना भी महत्वपूर्ण है। यह कहना आसान है,लेकिन जब गढ़वाल ही नहीं,भारत सहित छोटे देशों में UNO और WTO जैसी संस्थाओं से संपर्क स्थापित करना बहुत बड़ी उपलब्धि थी। वर्ष 1988 में डॉ.काला को विश्व की पहली पर्यटन सम्मेलन वैंकूवर,कनाडा में आमंत्रित किया गया। उनके शोधपत्र पर्यटन और मानव को सम्मेलन में स्वीकार किया गया और उन्हें समिति सत्र (Panel Speaker) के लिए भी चुना गया। इस सम्मेलन में लगभग 800 विद्वान और 86 विशेषज्ञ उपस्थित थे। इसमें पर्यटन को शांति का संबल मानते हुए पर्यटन-शांति के लिए एक महत्वपूर्ण शक्ति विषय पर चर्चा हुई। हालांकि बाद में पर्यटन को लाभ आधारित दृष्टिकोण से देखने की प्रवृत्ति सामने आई,जिसे डॉ.काला ने गंभीरतापूर्वक विरोध किया। 1993 में WTO ने उनके पत्र का उत्तर देते हुए पर्यटन की नई परिभाषा में उनके दृष्टिकोण को महत्व दिया। डॉ.काला की परिभाषा है-पर्यटन समाज द्वारा स्थापित एक सामाजिक संस्था है,जो मानव (यात्री) और उसके आस-पास के पूरे पर्यावरण के उत्थान के लिए यात्रा के इच्छित कार्य के माध्यम से कार्य करती है। डॉ.काला ने पर्यटन का शून्य काल सिद्धांत प्रतिपादित किया,जिसे कुछ विद्वानों ने पर्यटन नियोजन और आकलन के लिए महत्वपूर्ण माना। डॉ.काला हिमालयन संस्थान के निदेशक और गढ़वाल विश्वविद्यालय में पर्यटन विभाग के एकल प्राध्यापक भी रहे। उन्होंने गढ़वाल विश्वविद्यालय का अंतरराष्ट्रीय शोधपत्रिका हिमालय अध्ययन पत्रिका के प्रधान संपादक के रूप में कार्य किया,जो तत्कालीन ISSN श्रेणी का अंतरराष्ट्रीय शोधपत्र था। इसे कई देशों की संस्थाओं ने पर्यावरण,हिमालय और विकास का महत्वपूर्ण दस्तावेज माना। डॉ.काला ने विपरो आंदोलन ( विध्वंसकारी पर्यटन रोको) शुरू किया और WTO को चुनौती दी। उन्होंने पर्यटन की विध्वंसकारी प्रवृत्तियों के खिलाफ विश्व स्तरीय आंदोलन किया। इसके लिए उन्हें विश्व पर्यटन दिवस पर सम्मान और साधुवाद प्राप्त हुआ। उन्हें गांधीयन पर्यटन की अवधारणा का सूत्रपात करने वाला और बहुमुखी प्रतिभा के धनी वैज्ञानिक माना जाता है। प्रमुख तकनीकी स्रोतों ने भी डॉ.काला को गांधीयन पर्यटन,विपरो आंदोलन और पर्यटन शून्य काल सिद्धांत का प्रतिपादक मान्यता दी है। उक्त सभी उपलब्धियों के लिए उन्हें अटल भारत सम्मान फाउंडेशन द्वारा पुरस्कृत किया गया। प्रमुख प्रतियोगी पत्रिकाओं ने भी उनके कार्यों को IAS और PCS परीक्षा में स्मरणीय तथ्य के रूप में प्रकाशित किया। डॉ.काला उत्तर प्रदेश पर्यावरण विभाग द्वारा प्रदत्त शोध परियोजना के मुख्य अन्वेषक और पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन में सक्रिय सदस्य भी रहे। उन्होंने श्रीनगर में कर्फ्यू तोड़ कर गिरफ्तारी दी और अपने स्वयं के खर्चे से सभी आंदोलन सम्पन्न किए,कभी किसी फंड सहायता पर निर्भर नहीं रहे।