
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक रुद्रप्रयाग जनपद की बच्छणस्यूं पट्टी स्थित ग्राम बणगांव मल्ला एक बार फिर आस्था,परंपरा और लोक-संस्कृति के रंग में रंगने जा रहा है। विगत पांच वर्षों के अंतराल के बाद ग्राम स्थित मां भगवती ऊंफरई देवी के पावन धाम में 21 व 22 दिसंबर को दो दिवसीय ऊंफरई देवी पूजन एवं पांडव गैंडी लोकनृत्य का भव्य आयोजन किया जा रहा है। भले ही समय और परिस्थितियों के चलते ग्राम बणगांव मल्ला तथा आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग रोजगार और शिक्षा की तलाश में पलायन कर चुके हों,लेकिन अपनी मिट्टी,देवी-देवताओं और परंपराओं से उनका भावनात्मक रिश्ता आज भी उतना ही मजबूत है। यही कारण है कि इस पावन अवसर पर देश-प्रदेश के दूर-दराज क्षेत्रों में रह रहे प्रवासी ग्रामीण,साथ ही मायके की पुकार पर बहन-बेटियां एवं ध्याणियां भी विशेष रूप से अपने पैतृक गांव पहुंचती हैं। यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि बिखरे हुए परिवारों को जोड़ने,पीढ़ियों को संस्कृति से जोड़ने और पलायन के दर्द के बीच अपनी पहचान को जीवित रखने का माध्यम भी बनता है। इन दो दिनों में सूना पड़ा गांव एक बार फिर बच्चों की किलकारियों,ढोल-दमाऊं की थाप और लोकगीतों की गूंज से जीवंत हो उठता है। लोकमान्यता के अनुसार ऊंफरई देवी एक जागृत देवी हैं। कहा जाता है कि देवी पूजन के दिन शेर नदी से जल लाकर मंदिर परिसर की परिक्रमा करता है। ढोल-दमाऊं की थाप के बीच देवी-देवताओं की उपासना की जाती है और पश्वा के शरीर में अवतरित होकर देवी-देवता क्षेत्रवासियों को दर्शन देकर सुख-समृद्धि और कल्याण का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। मां भगवती ऊंफरई देवी के पुजारी मातवर सिंह के मार्गदर्शन में आयोजित इस आयोजन को सफल बनाने में ताजबर सिंह,विनोद सिंह,अनिल सिंह,दिलबर सिंह,सावर सिंह,कुंवर सिंह,सते सिंह,रतन सिंह,बीरबल सिंह,हर्ष सिंह,दिनेश सिंह,बलबीर सिंह नेगी,गुलाब सिंह,रघुवीर सिंह,गोकुल सिंह,राजेंद्र सिंह,लक्ष्मण सिंह,साब सिंह,हरी सिंह,शम्भू सिंह,मनोहर सिंह,मदन सिंह,मनबर सिंह,भरत सिंह सहित समस्त ग्रामवासी,युवा वर्ग,महिला मंगल दल एवं बुजुर्ग सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। पांडव गैंडी लोकनृत्य देवभूमि की प्राचीन लोक-परंपरा का जीवंत प्रतीक है,जो महाभारत कालीन कथाओं से जुड़कर वीरता,आस्था और सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्त करता है। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ करता है,बल्कि पलायन के दौर में भी गांव,संस्कृति और रिश्तों को जोड़ने वाली एक मजबूत कड़ी बनकर उभरता है। निस्संदेह बणगांव मल्ला में आयोजित यह पावन दो दिवसीय महोत्सव देवभूमि उत्तराखंड की लोक-संस्कृति,सामूहिक स्मृतियों और आध्यात्मिक विरासत को सहेजने का एक प्रेरणादायी उदाहरण है।