
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। किसानों के हित में चलाई जा रही केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं पर विभागीय तंत्र किस तरह पानी फेर रहा है,यह देखना हो तो कृषि एवं उद्यान विभाग की कार्यप्रणाली पर एक नजर डालिए। पहले आओ पहले पाओ के नाम पर योजनाओं का लाभ देने का दावा करने वाला विभाग असल में पहले दो फिर पाओ की परंपरा पर चल पड़ा है। विभागीय आदेशों के अनुसार योजनाओं का लाभ लेने के लिए कृषक को उद्यान कार्ड,आधार कार्ड, खतौनी तथा पासपोर्ट साइज फोटो के साथ आवेदन जमा करना अनिवार्य है। नियम स्पष्ट हैं-जो पहले आवेदन करेगा,वही पहले लाभ पाएगा। आवेदन की तारीख पंजिका में दर्ज होनी चाहिए और उसी क्रम में चयन होना चाहिए। केंद्र प्रभारी से लेकर मुख्य उद्यान अधिकारी कार्यालय तक चयन प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से अपनाने का प्रावधान है। लेकिन व्यवहार में यह प्रक्रिया सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है। पहले चैक दो,फिर योजना लो-नई परंपरा का उदय स्थानीय स्तर पर देखने में आ रहा है कि योजनाओं का लाभ उन्हीं कृषकों को दिया जा रहा है जो योजना के लिए आवेदन के साथ ब्लैंक चेक विभाग या कार्यदायी फर्मों को सौंपते हैं। यह चेक बाद में अनुदान वितरण की डीबीटी प्रक्रिया को कानूनी रूप देने का साधन बन जाता है। यानी किसान को दिखाया जाता है कि अनुदान उसके खाते में गया,पर असल में पूरा खेल कागजों में चलता है। यह प्रणाली न केवल प्रधानमंत्री डीबीटी योजना की भावना के विपरीत है बल्कि किसानों की मेहनत पर खुला प्रहार है। इस वर्ष विभाग द्वारा शीतकालीन फल पौध योजना के अंतर्गत किसानों से आधी कीमत पूर्व में जमा करवाई जा रही है। बताया जा रहा है कि विभाग कमिशन तंत्र के दबाव में मनचाही नर्सरियों से निम्न गुणवत्ता की पौध क्रय कर किसानों को उपलब्ध कराएगा। बाद में अनुदान की राशि डीबीटी के माध्यम से किसानों के खाते में भेज दी जाएगी ताकि सब कुछ कानूनी लगे। परंतु असलियत यह है कि किसान को न तो अपनी पसंद की पौध चुनने का अधिकार दिया जा रहा है और न ही गुणवत्ता की कोई गारंटी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चलाई गई डीबीटी योजना का उद्देश्य था-किसान अपनी पसंद की उच्च गुणवत्ता वाली पौध स्वयं खरीदे और सरकार उसका अनुदान सीधे खाते में डाले। परंतु उद्यान विभाग की मौजूदा व्यवस्था इस भावना का घोर उल्लंघन कर रही है। विभाग द्वारा योजनाओं का क्रियान्वयन जिस प्रकार किया जा रहा है,वह किसानों के अधिकारों और सरकारी नीतियों दोनों के साथ छल है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि किसानों के अधिकारों पर खुला डाका है। विभाग को चाहिए कि वह लाभार्थी चयन की प्रक्रिया को पारदर्शी,दिनांक-आधारित और ऑनलाइन ट्रैक योग्य बनाए,ताकि हर किसान देख सके कि उसका आवेदन कब और किस स्थिति में है। कृषि एवं उद्यान विभाग की यह अपारदर्शी व्यवस्था अगर यूं ही चलती रही तो सरकार की मंशा चाहे जितनी किसान हितैषी क्यों न हो,लाभ कागज़ी किसानों तक ही सीमित रह जाएगा,असली किसान फिर छले जाएंगे।