पहाड़ की पहचान किनगोड़ पर संकट-अंधाधुंध दोहन से विलुप्ति की कगार पर दारूहल्दी

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखण्ड के हरे-भरे पहाड़ों में कभी सहजता से दिखाई देने वाला किनगोड़ (दारूहल्दी) आज धीरे-धीरे इतिहास बनने की ओर अग्रसर है। पीले सुनहरे फूलों से सजी

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखण्ड के हरे-भरे पहाड़ों में कभी सहजता से दिखाई देने वाला किनगोड़ (दारूहल्दी) आज धीरे-धीरे इतिहास बनने की ओर अग्रसर है। पीले सुनहरे फूलों से सजी यह कांटेदार झाड़ी न केवल पहाड़ की जैव विविधता की पहचान थी,बल्कि स्थानीय लोगों के खानपान और पारंपरिक औषधीय ज्ञान का भी अहम हिस्सा रही है। आज हालात यह हैं कि जहां कभी जंगलों की ढलानों पर किनगोड़ की झाड़ियां लहलहाती थीं,वहां अब इसकी झलक पाना भी दुर्लभ हो गया है। पहाड़ की पहचान किनगोड़-दारूहल्दी जिसे स्थानीय भाषा में किनगोड़ कहा जाता है,एक कांटेदार झाड़ीदार पौधा है जिसमें बसंत ऋतु में छोटे-छोटे चमकीले पीले फूल खिलते हैं। इन्हीं फूलों के बाद छोटे-छोटे फल लगते हैं,जिनका स्वाद खट्टा-मीठा होता है और पहाड़ के लोग इन्हें बड़े चाव से खाते थे। यह पौधा सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं है इसकी जड़ें और छाल पारंपरिक आयुर्वेद में उपयोगी मानी जाती हैं,त्वचा रोग,पाचन,खुजली,दाद,फोड़े-फुंसी,समस्याओं और संक्रमण में इसका उपयोग होता रहा है,मधुमेह-ब्लड शुगर को नियंत्रित करने तथा पीलिया,लीवर,आंखों के संक्रमण आदि औषधीय गुण से भरपूर पहाड़ की प्राकृतिक दवा का खजाना है,यह प्राकृतिक एंटीबायोटिक गुणों से भरपूर माना जाता है। लुप्त होने की सबसे बड़ी वजह लालच और अज्ञानता विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों के अनुसार किनगोड़ के तेजी से गायब होने का मुख्य कारण इसका अवैज्ञानिक दोहन है। जड़ी-बूटी के नाम पर इसकी जड़ों को बड़े पैमाने पर उखाड़ा जा रहा है व्यापारी और कुछ लोग बिना पुनरोपण के इसे नष्ट कर रहे हैं। जंगलों में बढ़ती मानवीय गतिविधियां और आग भी इसके अस्तित्व पर खतरा हैं परिणामस्वरूप यह बहुमूल्य पौधा अब कई क्षेत्रों से पूरी तरह गायब हो चुका है। किनगोड़ केवल एक पौधा नहीं बल्कि पहाड़ की संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली का हिस्सा है। इसके खत्म होने से स्थानीय जैव विविधता को नुकसान हो रहा है,पारंपरिक औषधीय ज्ञान लुप्त हो रहा है,नई पीढ़ी इस प्राकृतिक धरोहर से वंचित हो रही है,जरूरत है संरक्षण की अभी नहीं तो कभी नहीं अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां किनगोड़ को केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी। क्या किया जा सकता है-इस पौधे के अवैध दोहन पर सख्त रोक लगे,वन विभाग द्वारा इसके संरक्षण और पुनरोपण अभियान चलाए जाएं,स्थानीय लोगों को इसके महत्व के प्रति जागरूक किया जाए,औषधीय उपयोग के लिए नियंत्रित और वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं। उत्तराखण्ड की पहचान उसके जंगलों,जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक संपदा से है। यदि इन्हें बचाने के लिए अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह सिर्फ एक पौधे का नहीं बल्कि हमारी संस्कृति और प्रकृति के एक अहम अध्याय का अंत होगा। अब वक्त है जागरूक होने का,अपनी विरासत को बचाने का क्योंकि किनगोड़ केवल एक पौधा नहीं पहाड़ की पहचान है।

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