
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। आज 7 अप्रैल को देवभूमि उत्तराखंड की धरती पर महिला सशक्तिकरण और कृषि उद्यमिता को नई दिशा देने की पहल के तहत श्रीनगर में एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभाग एवं मौल्यार फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस एक दिवसीय संगोष्ठी का विषय उत्तराखंड की महिला किसान उद्यमी-स्थानीय ज्ञान से वैश्विक लक्ष्यों तक सतत आजीविका का मार्ग रहा,जिसमें देशभर से आए विशेषज्ञों,शिक्षाविदों और महिला उद्यमियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता कुलपति प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह ने अपने संबोधन की शुरुआत दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों से आई महिला उद्यमियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए की। उन्होंने पहाड़ी महिलाओं की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी कृषि क्षेत्र में निरंतर योगदान की सराहना करते हुए कहा कि उत्तराखंड के पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने का समय आ चुका है। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के हर परिवार एक उत्पाद के सिद्धांत को अपनाते हुए स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने का आह्वान किया और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक नवाचार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। संगोष्ठी में प्रो.ए.के.बागी ने पारंपरिक उत्पादों के संरक्षण के साथ-साथ पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पहाड़ की जैव विविधता और कृषि परंपराएं एक-दूसरे की पूरक हैं,जिन्हें बचाए रखना अत्यंत जरूरी है। साथ ही उन्होंने आधुनिक परिवहन और विपणन तंत्र के माध्यम से पहाड़ी उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की रणनीति विकसित करने पर जोर दिया। कृषि विज्ञान संकायाध्यक्ष प्रोफेसर ए.के.नेगी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि कृषि क्षेत्र में पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण आज की सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने चेतावनी दी कि पुरानी कृषि पद्धतियां धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, जिन्हें पुनर्जीवित करने की दिशा में ठोस प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से बाजार से सीधा जुड़ाव बनाने और नीति निर्माण के लिए संस्थागत सहयोग को अनिवार्य बताया। महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर ममता पांगती ने कहा कि आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं,लेकिन कृषि क्षेत्र में उन्हें उद्यमी के रूप में स्थापित करने की दिशा में अभी और प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने उत्तराखंड की महिलाओं के पारंपरिक ज्ञान को अंतरराष्ट्रीय विकास लक्ष्यों से जोड़ने और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से वैश्विक पहचान दिलाने की बात कही। दिल्ली विश्वविद्यालय के डूटा अध्यक्ष ने पहाड़ी महिलाओं को पहाड़ की रीढ़ बताते हुए उनके साहस और संघर्ष की सराहना की। उन्होंने कहा कि विषम परिस्थितियों में भी कृषि कार्य को संभालना महिलाओं की अद्भुत क्षमता को दर्शाता है,जिसे अब उद्यमिता में परिवर्तित करने का समय है। संगोष्ठी के संयोजक एवं ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभागाध्यक्ष आर.एस.नेगी ने महिला कृषि उद्यमिता को वर्तमान समय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि जमीनी स्तर के उद्यमियों,कृषि विशेषज्ञों और गैर-लाभकारी संगठनों के समन्वय से ही सतत विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। राष्ट्रीय सह-संयोजक दुर्गा सिंह भंडारी ने विश्वविद्यालय के सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हुए मौल्यार फाउंडेशन के उद्देश्यों को महिलाओं के समग्र विकास से जोड़ने पर बल दिया। वहीं सह-संयोजक डॉ.संतोष ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों का स्वागत एवं अभिनंदन किया। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ.अंकित सती एवं शोध छात्रा प्रतिभा द्वारा किया गया,जिन्होंने पूरे आयोजन को सुव्यवस्थित और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। श्रीनगर में आयोजित यह राष्ट्रीय संगोष्ठी न केवल महिला किसान उद्यमिता को नई दिशा देने का प्रयास रही,बल्कि यह भी स्पष्ट कर गई कि यदि स्थानीय ज्ञान,आधुनिक तकनीक और संस्थागत सहयोग का समन्वय हो,तो उत्तराखंड की पहाड़ी महिलाएं वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकती हैं।