
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध लोक-संस्कृति सदियों से प्रकृति,परंपरा और मानवीय संवेदनाओं की अद्भुत धरोहर रही है। इन्हीं लोक परंपराओं में एक अत्यंत पावन और हृदयस्पर्शी पर्व है फूल देई जो प्रत्येक वर्ष चैत्र मास की संक्रांति को पूरे उत्तराखंड में बड़े उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व केवल वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक नहीं है,बल्कि यह प्रकृति के श्रृंगार,बेटियों के मायके के प्रति प्रेम और लोक जीवन की संवेदनशीलता का भी जीवंत प्रतीक है। प्रकृति की गोद में बसे उत्तराखंड के पहाड़ों में जब वसंत की पहली किरणें धरती को स्पर्श करती हैं,तो पहाड़ों की ढलानों पर बुरांश,फ्योंली और सरसों के फूल खिल उठते हैं। इन्हीं रंग-बिरंगे फूलों के साथ छोटे-छोटे बच्चे गांव और शहरों की गलियों में निकलते हैं और घर-घर जाकर देहरियों पर फूल अर्पित करते हुए मंगल गीत गाते हैं फूल देई,छम्मा देई,देणी द्वार,भरी भकार,ये देली सौं बारम्बार नमस्कार। यह गीत केवल एक परंपरा नहीं बल्कि घर-घर में सुख,समृद्धि,शांति और खुशहाली की मंगलकामना का संदेश है। फ्योंली की मार्मिक कथा: त्याग और प्रेम की अमर गाथा फूल देई पर्व के पीछे एक अत्यंत भावुक और लोकमान्य कथा भी प्रचलित है,जो फ्योंली नाम की एक वन-कन्या से जुड़ी हुई है। लोककथाओं के अनुसार फ्योंली अत्यंत सुंदर और प्रकृति प्रेमी कन्या थी,जो जंगलों और पहाड़ों के बीच प्रकृति की गोद में पली-बढ़ी थी। उसके सानिध्य से जंगल के पशु-पक्षी और पेड़-पौधे मानो जीवंत हो उठते थे। समय आने पर फ्योंली का विवाह दूर देश के एक राजकुमार से हो गया। विवाह के बाद जब वह अपने ससुराल चली गई,तो उसे अपने मायके के पहाड़,जंगल और प्रकृति की अत्यधिक याद आने लगी। मायके के प्रति उसके प्रेम और विरह की पीड़ा इतनी गहरी थी कि वह धीरे-धीरे अस्वस्थ हो गई और अंततः उसने प्राण त्याग दिए। मृत्यु से पहले उसकी अंतिम इच्छा थी कि उसे उसके मायके की मिट्टी में ही दफनाया जाए। कहा जाता है कि जहां फ्योंली को दफनाया गया,वहीं कुछ समय बाद पीले रंग का एक सुंदर फूल खिला,जिसे आज फ्योंली के नाम से जाना जाता है। हर वर्ष चैत्र मास के आगमन पर यह फूल खिलकर मानो अपनी मायके की देहरी को सजाने आ जाता है। यही कारण है कि आज भी बच्चे फूल देई के दिन घर-घर जाकर फूल अर्पित करते हैं,मानो वे उस बेटी के आगमन का स्वागत कर रहे हों जो अपने मायके की खुशहाली की कामना करती है। बालपन का उत्साह और लोक परंपरा की जीवंतता फूल देई पर्व बच्चों के लिए विशेष उत्सव का अवसर होता है। सुबह-सुबह बच्चे टोकरी या कंडी में फूल सजाकर गांव और शहर की गलियों में निकल पड़ते हैं। वे घर-घर की देहरी पर फूल बिखेरते हैं और आशीर्वाद स्वरूप चावल,गुड़,अनाज या दक्षिणा प्राप्त करते हैं। यह परंपरा बच्चों को केवल उत्साह ही नहीं देती बल्कि उन्हें अपनी संस्कृति,लोकभाषा और परंपराओं से भी जोड़ती है। इस अवसर पर घरों की देहरियों को साफ कर फूलों से सजाया जाता है,जो समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। प्रख्यात साहित्यकार डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला देवभूमि के अनुसार फूल देई केवल एक त्योहार नहीं,बल्कि यह समाज को कई महत्वपूर्ण संदेश देता है। सबसे पहले यह पर्व हमें प्रकृति संरक्षण की प्रेरणा देता है। पहाड़ों में फूल तोड़ते समय प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलन बनाए रखने की सीख दी जाती है। यह पर्व पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन विशेष रूप से बेटियों और ध्याणियों को याद किया जाता है और उन्हें भिटौली के रूप में उपहार भेजे जाते हैं,जिससे मायके और ससुराल के बीच स्नेह का संबंध और प्रगाढ़ होता है। यह पर्व लोक संस्कृति और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। जब बच्चे फूल देई के गीत गाते हैं,तो वे अनजाने में ही अपनी भाषा,संस्कृति और परंपरा को जीवित रख रहे होते हैं। फूल देई केवल फूलों का उत्सव नहीं है,बल्कि यह उत्तराखंड की लोक संस्कृति की आत्मा है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ने,प्रकृति के प्रति सम्मान जगाने और बेटियों के स्नेह व संवेदनाओं को समझने की प्रेरणा देता है। चैत्र संक्रांति के इस पावन अवसर पर जब पहाड़ों की देहरियां फूलों से सजती हैं, तो मानो हर आंगन में वह पीला फ्योंली का फूल खिल उठता है,जो अपनी मायके की खुशहाली की कामना करते हुए पूरी देवभूमि को सुगंधित कर देता है। फूल देई पर्व उत्तराखंड की संस्कृति,परंपरा और प्रकृति प्रेम का ऐसा अमूल्य प्रतीक है,जिसकी महक सदैव हमारी मिट्टी,हमारी स्मृतियों और हमारी लोक चेतना में जीवित रहेगी।