
गबर सिंह भण्डारी हिमालय टाइम्स
श्रीनगर गढ़वाल। समाज कोई स्थिर या अपरिवर्तनीय संरचना नहीं है,बल्कि समय,परिस्थितियों और विचारों के साथ निरंतर परिवर्तनशील प्रक्रिया है। वर्तमान समय में भारतीय समाज तीव्र बदलाव के दौर से गुजर रहा है। वैश्वीकरण,तकनीकी विकास,शहरीकरण और शिक्षा के विस्तार ने सामाजिक जीवन के हर पहलू को गहराई से प्रभावित किया है। जहां एक ओर विकास की रफ्तार तेज हुई है,वहीं दूसरी ओर इसके प्रभाव से पारंपरिक सामाजिक संरचनाएं कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों का चलन,परंपरागत जीवन-शैली से आधुनिकता की ओर बढ़ता समाज और प्रत्यक्ष संवाद की जगह डिजिटल संवाद का बढ़ता प्रभाव इस परिवर्तन की स्पष्ट झलक प्रस्तुत करता है। तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है,लेकिन इसके साथ कई सामाजिक चुनौतियां भी सामने आई हैं। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नया मंच दिया है,परंतु इसके दुरुपयोग से भ्रम,अफवाह,मानसिक तनाव और वैचारिक ध्रुवीकरण जैसी समस्याएँ बढ़ी हैं। डिजिटल दुनिया में बढ़ती व्यस्तता के कारण वास्तविक सामाजिक रिश्तों में दूरी,संवेदनहीनता और अकेलेपन की भावना गहराती जा रही है। इसके अतिरिक्त आर्थिक असमानता,बेरोजगारी और संसाधनों का असमान वितरण सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है। विकास की चमक के पीछे छिपी ये असमानताएं समाज में असंतोष और अस्थिरता को जन्म दे रही हैं। भविष्य की ओर देखें तो चुनौतियां और भी गंभीर रूप लेती दिख रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन के बढ़ते प्रभाव से रोजगार के स्वरूप में बड़े बदलाव की संभावना है। ऐसे में युवाओं के लिए केवल तकनीकी ज्ञान नहीं,बल्कि कौशल-विकास,नैतिक शिक्षा और मानवीय मूल्यों की समझ भी अनिवार्य होगी। वहीं पर्यावरण संकट,जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों का तीव्र क्षरण मानव समाज के लिए दीर्घकालिक खतरा बनता जा रहा है। यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं साधा गया,तो इसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ेंगे। आज के दौर में सहिष्णुता,आपसी सम्मान और सामाजिक समरसता को बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। विविधताओं से भरे समाज में संवाद और समझदारी ही स्थायी समाधान का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन सभी चुनौतियों का समाधान शिक्षा,सार्थक संवाद और सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। यदि तकनीकी प्रगति के साथ मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक उत्तरदायित्व को संतुलित रखा जाए,तो बदलते सामाजिक परिदृश्य में भी एक सकारात्मक,सशक्त और संवेदनशील समाज का निर्माण किया जा सकता है।