
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। आगामी चार नवंबर से आरंभ होने वाले ऐतिहासिक बैकुंठ चतुर्दशी मेले की तैयारियों को देखते हुए भागीरथी कला संगम के सदस्यों ने आज प्राचीन कमलेश्वर मंदिर परिसर में स्वच्छता अभियान चलाया। मंदिर प्रांगण के साथ-साथ उन कक्षों की भी पूरी तरह धुलाई एवं सफाई की गई,जहां मेला अवधि में श्रद्धालु और दीए जलाने वाले भक्तजन ठहरते हैं। संस्था के सभी सदस्यों ने निःस्वार्थ भाव से श्रमदान करते हुए स्वच्छता कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न किया। इस अवसर पर मंदिर के महंत आशुतोष पुरी ने संस्था के सभी सदस्यों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के अभियान न केवल श्रद्धालुओं के लिए सुविधा का माध्यम हैं,बल्कि यह हमारे मंदिरों की पवित्रता और परंपरा की रक्षा का प्रतीक भी हैं। उन्होंने सभी को आगामी बैकुंठ चतुर्दशी मेले के लिए शुभकामनाएं दीं। संस्था के उपाध्यक्ष मुकेश नौटियाल ने बताया कि मेला निकट है,इसलिए हम स्वच्छता और व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। हालांकि फिलहाल हमारी टीम का पूरा ध्यान एक नवंबर को होने वाले इगास पर्व पर केंद्रित है। इस पर्व को हम तन-मन-धन से भव्य रूप में मनाने जा रहे हैं। हमारे भैला की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और पूरा संगम इस पर्व को लोक संस्कृति के रंग में रंगने को उत्साहित है। वहीं संस्था के निर्देशक मदन गड़ोई ने कहा कि इगास कार्यक्रम एक नवंबर की शाम सात बजे से आरंभ होगा। इस दौरान माधो सिंह भंडारी के जीवन पर आधारित नृत्य-नाटिका मंचित की जाएगी। इसके साथ पारंपरिक झूमेला कार्यक्रम और भैला खेल का भी आयोजन होगा,जिससे स्थानीय संस्कृति की झलक पूरे उत्साह के साथ प्रदर्शित की जाएगी। अभियान के दौरान रवि पुरी,भगत सिंह बिष्ट,मुकेश नौटियाल,दीनबंधु सिंह चौहान सहित कई सदस्य सक्रिय रूप से मौजूद रहे। भागीरथी कला संगम का यह प्रयास न केवल स्वच्छता और श्रद्धा का संदेश देता है,बल्कि समाज में लोक संस्कृति और सामूहिक जिम्मेदारी की मिसाल भी पेश करता है। भागीरथी कला संगम जैसी संस्थाएं समाज में संवेदना,संस्कृति और सहयोग की जीवंत पहचान हैं। इन युवाओं का प्रयास बताता है कि अगर निष्ठा और लगन से कोई काम किया जाए,तो वह समाज में परिवर्तन का प्रतीक बन जाता है। स्वच्छता अभियान हो या लोक पर्वों का आयोजन-यह टीम आधुनिकता के दौर में भी गढ़वाल की परंपराओं को जिंदा रखने का अद्भुत कार्य कर रही है। ऐसे प्रयासों से ही आने वाली पीढ़ियां अपने संस्कार और संस्कृति से जुड़ी रहेंगी।