
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड जहां कभी पहाड़ों की गोद में बसे गांवों से बच्चों की किलकारियां,पशुओं की घंटियां और लोकगीतों की गूंज सुनाई देती थी। जहां जंगल और इंसान एक-दूसरे के सहचर थे,दुश्मन नहीं। आज उसी देवभूमि के पहाड़ खामोश हैं,गांव वीरान हैं और जंगलों से निकलकर तेंदुए और भालू इंसानी बस्तियों में मौत बनकर दस्तक दे रहे हैं। यह केवल जंगली जानवरों का आतंक नहीं,बल्कि वर्षों की नीतिगत भूलों,बेलगाम पलायन और प्रकृति के साथ किए गए अन्याय की भयावह परिणति है। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों की दुर्दशा अब पूरे देश के सामने आ रही है। पहले से ही पलायन की मार झेल रहे भूतिया हो चुके गांवों में रहने वाले गिने-चुने लोगों के सामने जीवन पहाड़ जैसा कठिन हो चुका है। हालात ऐसे हैं कि अब उनके लिए घर से बाहर निकलना भी जानलेवा बनता जा रहा है। यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ,बल्कि इसके पीछे राज्य की तमाम सरकारों की नीतिगत विफलताएं और प्रकृति के साथ किया गया लगातार खिलवाड़ जिम्मेदार है।
क्यों बढ़ रहे हैं वन्यजीवों के हमले
उत्तराखंड में बीते कुछ वर्षों से तेंदुओं और भालुओं के हमलों में चिंताजनक तेजी आई है। पिछले तीन वर्षों में ही पहाड़ी इलाकों में 50 से अधिक लोग इन हमलों का शिकार बन चुके हैं,जिनमें महिलाओं और बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। चार-पांच दशक पहले ऐसी घटनाएं अपवाद स्वरूप होती थीं। तब कई वर्षों में एकाध तेंदुआ या बाघ आदमखोर बनता था,लेकिन आज हमले लगातार हो रहे हैं। यह स्थिति सीधे तौर पर वन विभाग और सरकार की नाकामी की ओर इशारा करती है।
कहां से आ रहे हैं ये खूंखार जानवर
पहाड़ी क्षेत्रों में तेंदुओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है,लेकिन वन विभाग के पास न तो उनकी सटीक गिनती है और न ही ठोस निगरानी तंत्र। जब कोई दर्दनाक घटना घटती है,तभी विभाग की नींद खुलती है। झाड़ियों की कटाई और प्रतीकात्मक कार्रवाई कर एक-दो जानवरों को मारकर या पकड़कर लोगों को शांत कर दिया जाता है। अक्सर इन जानवरों को रीहैबिलिटेशन सेंटर में रखने के बाद फिर से पहाड़ी इलाकों में छोड़ दिया जाता है। ऐसे में ये जानवर अपना सबसे आसान शिकार तलाशते हैं और इंसान-खासतौर पर महिलाएं और बच्चे-उनका निशाना बनते हैं। एक बार इंसानी शिकार का स्वाद लगने के बाद यह प्रवृत्ति और खतरनाक हो जाती है।
इंसान-वन्यजीव संघर्ष से पर्यावरण पर संकट
पहाड़ों में शुरू हुआ यह संघर्ष केवल जान-माल का नहीं,बल्कि पर्यावरण के अस्तित्व का भी है। जानवरों के हमलों के बाद जंगलों में आग लगाने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। गुस्से और डर में लोग जंगलों को ही निशाना बना सकते हैं। इससे जानवर जंगल छोड़कर बस्तियों की ओर भागेंगे और संघर्ष और गहरा होगा। यदि समय रहते समाधान नहीं निकला,तो यह खूनी चक्र कभी नहीं रुकेगा।
जैव विविधता पर गहरा प्रहार
उत्तराखंड के जंगलों में लगने वाली आग से जैव विविधता का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। कई पशु-पक्षी प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं। जमीन पर रेंगने वाले जीव तेजी से खत्म हो रहे हैं। जंगलों में मौजूद प्राकृतिक जलस्रोत सूख चुके हैं,जिससे वन्यजीव पानी और भोजन की तलाश में इंसानी बस्तियों की ओर आने को मजबूर हैं।
जलस्रोतों की उपेक्षा,भविष्य पर खतरा
पहाड़ी गांव कभी सोच-समझकर बसाए गए थे। हर गांव के आसपास कम से कम दो-तीन जलस्रोत हुआ करते थे। आज ये स्रोत सूख चुके हैं। सरकार प्राकृतिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने के बजाय पंपिंग योजनाओं पर निर्भर हो गई है। इससे लोग जलस्रोतों से कटते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नदियों का जलस्तर गिरा तो आने वाले समय में पानी की एक बूंद भी नहीं बचेगी।
पलायन-हर समस्या की जड़
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में पलायन विकराल रूप ले चुका है। जिन गांवों में कभी सैकड़ों लोग रहते थे,वहां आज अर्थी को कंधा देने वाले लोग भी नहीं बचे। कुछ बुजुर्ग अपनी जड़ों में ही अंतिम सांस लेने का इंतजार कर रहे हैं,जबकि बाकी लोग मजबूरी में शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। जब गांव आबाद थे,तब इंसानी हलचल से जंगली जानवर डरते थे। आज खंडहर बने घरों का सन्नाटा उन्हें बस्तियों की ओर आकर्षित कर रहा है। अगर यही हाल रहा तो गांवों में इंसानों की जगह सिर्फ बंदर और तेंदुए ही नजर आएंगे।
शहरों का जहरीला भविष्य और सूने पहाड़
दिल्ली,नोएडा जैसे बड़े शहर गैस चैंबर बन चुके हैं। प्रदूषण लोगों की उम्र घटा रहा है,फिर भी पहाड़ के लोग लौटने को तैयार नहीं। स्वास्थ्य,शिक्षा और रोजगार की कमी ने पहाड़ों से उम्मीद ही छीन ली है। विशेषज्ञों का मानना है कि बेजान होते पहाड़ों की हर समस्या का समाधान रिवर्स पलायन में ही छिपा है। पर्यावरण संरक्षण की उम्मीद की किरण इन्हीं हालातों के बीच ग्राम नंदा खेत बीरोंखाल जनपद पौड़ी गढ़वाल के निवासी और चीड़ हटाओ बाज लगाओ अभियान के संस्थापक रमेश चन्द्र बोड़ाई उम्मीद की मजबूत मिसाल हैं। वे पिछले 23 वर्षों से अपने निजी प्रयासों से इस अभियान को चला रहे हैं। अब तक लगभग 32 हजार पौधे अपने खर्चे पर लगा चुके हैं। वे अपनी पेंशन से ही इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं और सरकार या किसी संस्था से कोई आर्थिक सहायता नहीं लेते। पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान के लिए उन्हें कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है। वर्ष 2025 में लैंसडाउन क्षेत्र में 2000 पेड़ों के वृक्षारोपण के लिए उन्हें आर्मी के सेंटर कमांडेंट और वन विभाग की मुखिया द्वारा सम्मानित किया गया। उत्तराखंड आज निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यदि अब भी सरकार और समाज नहीं जागा,तो यह संकट आने वाली पीढ़ियों के लिए अभिशाप बन जाएगा। रिवर्स पलायन,जलस्रोतों का संरक्षण,जंगलों की रक्षा और स्थानीय समुदायों को मजबूत किए बिना न तो वन्यजीवों का आतंक रुकेगा और न ही देवभूमि की आत्मा बच पाएगी।