मकर संक्रांति-आस्था,दान और प्रकृति के नवजागरण का महापर्व–डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। जब सूर्य अपनी दिशा बदलकर उत्तरायण की पावन यात्रा पर अग्रसर होता है,तब भारतवर्ष की सांस्कृतिक चेतना नव ऊर्जा से भर उठती है। प्रकृति के कण-कण में

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। जब सूर्य अपनी दिशा बदलकर उत्तरायण की पावन यात्रा पर अग्रसर होता है,तब भारतवर्ष की सांस्कृतिक चेतना नव ऊर्जा से भर उठती है। प्रकृति के कण-कण में उल्लास,आस्था और कृतज्ञता का भाव जाग्रत हो उठता है। यही वह शुभ क्षण है,जब मकर संक्रांति का महापर्व अंधकार से प्रकाश,निराशा से आशा और स्वार्थ से सेवा की ओर बढ़ने का प्रेरक संदेश लेकर उपस्थित होता है। यह पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं,बल्कि भारतीय जीवन दर्शन,सनातन परंपरा और मानवीय मूल्यों का जीवंत उत्सव है। हमारा भारतवर्ष केवल एक भौगोलिक भू-भाग नहीं,बल्कि पर्वों, उत्सवों और जीवंत परंपराओं का शाश्वत राष्ट्र है। यहां मनाया जाने वाला प्रत्येक पर्व किसी न किसी गहरे धार्मिक,वैज्ञानिक और सामाजिक चिंतन से जुड़ा होता है। मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का ऐसा ही विशिष्ट पर्व है,जो प्रकृति,परमात्मा और मानवता के सुंदर समन्वय का प्रतीक है। उत्तरायण: देवताओं के प्रभात का दिव्य संकेत पौष मास की समाप्ति और माघ मास के आगमन पर सूर्य जब धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं,तभी मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। मकर संक्रांति वह पुण्य बेला है,जब देवताओं का प्रभात होता है-अर्थात अंधकार से प्रकाश की यात्रा का आरंभ। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान,जप,तप,श्राद्ध एवं अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फलदायी होता है और साधक को सौ गुना पुण्य प्रदान करता है। ज्योतिषीय दृष्टि से मकर संक्रांति पिता सूर्य और पुत्र शनि के मिलन का पर्व है। सूर्य देव का शनि की राशि मकर में प्रवेश करना जीवन में अनुशासन,कर्म और समरसता के महत्व को दर्शाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि मतभेद भुलाकर प्रेम,सहिष्णुता और सामाजिक सौहार्द के साथ आगे बढ़ना ही सच्ची साधना है। अनेकता में एकता का उत्सव मकर संक्रांति भारत की सांस्कृतिक एकता की सजीव मिसाल है। देश के विभिन्न अंचलों में यह पर्व अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। पंजाब में लोहड़ी,दक्षिण भारत में पोंगल,गुजरात में उत्तरायण और देवभूमि उत्तराखंड में मकरैणी एवं खिचड़ी संक्रांति के रूप में यह पर्व जन-जन के जीवन में उल्लास भरता है। कुमाऊं अंचल में मकर संक्रांति को घुघती त्यार के रूप में विशेष उत्साह से मनाया जाता है। इस अवसर पर आटे और गुड़ से बने घुघते न केवल पारंपरिक व्यंजन हैं,बल्कि पारिवारिक स्नेह और सामाजिक आत्मीयता के प्रतीक भी हैं। बेटियों को घुघती भेंट करने की परंपरा रिश्तों की मिठास को और गहरा करती है। बच्चों द्वारा कौवों को बुलाते हुए गाया जाने वाला लोकगीत-काले कौवा काले,घुघती माला खा ले मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। मकर संक्रांति पर दान का विशेष महत्व है। शास्त्रों में घृत,तिल,अन्न और कंबल दान को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान जीवन के समस्त भोगों के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। यह पर्व समाज के वंचित वर्ग के प्रति संवेदना और उत्तरदायित्व का भाव जाग्रत करता है। 14 जनवरी 2026 को मनाई जाने वाली मकर संक्रांति इस वर्ष विशेष रूप से पुण्यदायी है। लगभग 23 वर्षों बाद ग्रहों का दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस दिन पुण्य काल, महापुण्य काल,एकादशी (परतिला/षटतिला) तथा अनुराधा नक्षत्र का अद्भुत योग उपस्थित है। अनुराधा नक्षत्र मित्रता,भक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है,जिससे यह दिन साधना और सेवा के लिए अत्यंत श्रेष्ठ बन जाता है। मकर संक्रांति केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं,बल्कि जीवन में नई ऊर्जा,नई सोच और नए संकल्पों के उदय का उत्सव है। यह पर्व हमें बाहरी स्नान के साथ-साथ आंतरिक शुद्धि का भी संदेश देता है-ताकि हम अपने मन के विकारों को त्यागकर प्रेम,सहयोग और सेवा के माध्यम से मानवता को समृद्ध कर सकें।

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