
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। मां दक्षिण काली का स्वरूप अत्यंत सौम्य,करुणामयी और भक्तों को अभय प्रदान करने वाला माना जाता है। उन्हें गृहस्थों की देवी कहा जाता है,जो अपनी संतान पर पुत्रवत स्नेह लुटाती हैं और बिना मांगे भी उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखती हैं। मां दक्षिण काली केवल शक्ति की अधिष्ठात्री नहीं,बल्कि वात्सल्य,विश्वास और पूर्ण समर्पण की जीवंत प्रतीक हैं। मां दक्षिण काली और उनके परम भक्त श्री रामकृष्ण परमहंस के जीवन से जुड़ा एक अत्यंत प्रेरणादायी प्रसंग आज भी साधकों और श्रद्धालुओं को जीवन की सही दिशा दिखाता है। प्रसंग: जगतजननी से क्या मांगूं,यह उस समय की घटना है जब श्री रामकृष्ण परमहंस दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पुजारी के रूप में सेवा कर रहे थे। मां काली के प्रेम में वे इतने लीन रहते थे कि उन्हें देह और संसार की सुध ही नहीं रहती थी। परिणामस्वरूप उनका परिवार घोर आर्थिक संकट से गुजर रहा था,यहां तक कि घर में भोजन की भी कठिनाई उत्पन्न हो गई थी। मंदिर के संरक्षक मथुर बाबू जो रामकृष्ण परमहंस के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे,उन्होंने यह स्थिति देखकर उनसे आग्रह किया बाबा आप तो साक्षात मां काली से बातें करते हैं। एक बार उनसे अपने परिवार की गरीबी दूर करने के लिए कुछ धन मांग लीजिए। मां आपकी बात अवश्य मानेंगी। सरल हृदय रामकृष्ण इस बात पर सहमत हो गए। मां के सम्मुख आत्मसमर्पण रात्रि का समय था। रामकृष्ण परमहंस यह विचार लेकर गर्भगृह में प्रवेश करते हैं कि आज वे मां से परिवार के लिए कुछ मांगेंगे। लेकिन जैसे ही उन्होंने मां दक्षिण काली की प्रतिमा की ओर दृष्टि डाली,उन्हें पत्थर की मूर्ति नहीं,बल्कि साक्षात चैतन्यमयी जगदंबा खड़ी दिखाई दीं। मां का तेजस्वी,ममतामयी और दिव्य स्वरूप देखकर वे भावविभोर हो गए। उनकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगी और वे सुध-बुध खो बैठे। उस क्षण वे यह भूल ही गए कि वे क्या मांगने आए थे। गदगद कंठ से उन्होंने प्रार्थना की मां मुझे शुद्ध भक्ति दे,मुझे ज्ञान दे,मुझे वैराग्य दे। ऐसा वरदान दे कि मैं तुझे कभी न भूलूं। बाहर आकर मथुर बाबू ने पूछा बाबा क्या मांगा,रामकृष्ण चौंकते हुए बोले अरे मैं तो भूल ही गया। मथुर बाबू ने उन्हें पुनः भेजा,लेकिन तीनों बार यही हुआ। मां के दर्शन होते ही उन्हें लगा कि जिस मां के चरणों में तीनों लोकों का वैभव है,उनसे नश्वर धन मांगना कितना तुच्छ है। हर बार वे केवल शुद्ध भक्ति ही मांगते रहे। अमूल्य उपदेश तीसरी बार बाहर आकर रामकृष्ण परमहंस ने मथुर बाबू से कहा मान लो किसी राजा की बेटी से मिलने का अवसर मिले,तो क्या उससे लौकी-कद्दू मांगना शोभा देता है। मां दक्षिण काली तो पूरे ब्रह्मांड की स्वामिनी हैं। जब वे मुझे अपना असीम प्रेम देने को तैयार हैं,तो मैं उनसे मिट्टी के ढेले (धन) क्यों मांगू,इस प्रसंग से मिलने वाली सीख यह प्रसंग केवल कथा नहीं,बल्कि जीवन का गूढ़ संदेश है-मां दक्षिण काली का वात्सल्य: मां जानती हैं कि उनकी संतान को वास्तव में क्या चाहिए। भक्ति की ऊंचाई: ईश्वर के निकट जाने पर सांसारिक इच्छाएं स्वतः छोटी हो जाती हैं। पूर्ण विश्वास: जो मां की शरण में है,उसका योगक्षेम मां स्वयं वहन करती हैं,उसे कुछ मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मां दक्षिण काली का यही दिव्य संदेश है-तू मेरा होकर तो देख,तुझे किसी चीज का अभाव नहीं रहेगा। यह प्रेरणादायी प्रसंग मां दक्षिण काली के प्रधान सेवक डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला की प्रवचन ग्रन्थावली से लिया गया और है,जो श्रद्धालुओं को भक्ति,विश्वास और समर्पण का मार्ग दिखाता है।