मेरी संस्कृति मेरी पहचान अभियान की हुई श्रीनगर से शुरुआत ब्रह्माकुमारीज ने दिया आध्यात्मिक पर्यटन से आत्म-जागरण का संदेश

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। ब्रह्माकुमारीज के शिपिंग,एविएशन एवं टूरिज्म विंग उत्तराखंड की रजत जयंती वर्षगांठ के अवसर पर रविवार को ब्रह्माकुमारीज के श्रीनगर गढ़वाल सेवा केंद्र में मेरी संस्कृति मेरी पहचान

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। ब्रह्माकुमारीज के शिपिंग,एविएशन एवं टूरिज्म विंग उत्तराखंड की रजत जयंती वर्षगांठ के अवसर पर रविवार को ब्रह्माकुमारीज के श्रीनगर गढ़वाल सेवा केंद्र में मेरी संस्कृति मेरी पहचान अभियान का शुभारंभ किया गया। यह अभियान उत्तराखंड की लोक-संस्कृति,अध्यात्म और पर्यटन को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास है,जिसका उद्देश्य राज्य को धार्मिक एवं आध्यात्मिक पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करना है। अभियान का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर अंबाला से पधारी ब्रह्माकुमारी शैली बहन ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि ब्रह्माकुमारी संस्था विगत 90 वर्षों से मानव समाज में नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार हेतु निरंतर कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि यह अभियान श्रीनगर से प्रारंभ होकर रुद्रप्रयाग,गुप्तकाशी,कर्णप्रयाग,ज्योतिर्मठ आदि स्थलों से होता हुआ 19 नवंबर को उत्तरकाशी में भव्य समापन के साथ पूर्ण होगा। शैली बहन ने कहा उत्तराखंड केवल देवभूमि नहीं,बल्कि संस्कृति भूमि भी है। यहां के पर्वत,नदियां और तीर्थ स्वयं अध्यात्म की जीवंत अनुभूति कराते हैं। हमारा प्रयास है कि उत्तराखंड को विश्व के आध्यात्मिक पर्यटन का केंद्र बनाया जाए। कार्यक्रम में गढ़वाल विश्वविद्यालय के वित्त अधिकारी डॉ.संजय ध्यानी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में एडवोकेट विवेक जोशी एवं होटल एसोसिएशन श्रीनगर के अध्यक्ष अप्पल रतूड़ी ने शिरकत की। मुख्य वक्ता के रूप में दिल्ली से पधारे ब्रह्माकुमार पीयूष भाई ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि उत्तराखंड भारत की आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रहा है। उन्होंने कहा यह वही भूमि है जहां जगद्गुरु आदि शंकराचार्य,महात्मा गांधी,कालिदास,स्वामी विवेकानंद और स्वामी रामतीर्थ जैसे महान विभूतियों ने आकर आत्म-साक्षात्कार की प्रेरणा प्राप्त की। उत्तराखंड की यह पावन धरा विश्व को फिर से शांति और सत्य के मार्ग पर अग्रसर कर सकती है। ब्रह्माकुमारीज के क्षेत्रीय निदेशक ब्रह्माकुमार मेहरचंद ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अतीत में भारत अध्यात्म और विज्ञान का केंद्र था। विदेशी आक्रमणों और पराधीन काल में हमारी संस्कृति पर अनेक प्रहार हुए,किंतु भारतीय संस्कृति आज भी अपने मूल्यों और आदर्शों के साथ जीवित है। ब्रह्माकुमारीज संस्था आज 140 देशों में राजयोग ध्यान और गीता के संदेश के माध्यम से भारतीय संस्कृति का गौरव पुनः स्थापित कर रही है। कार्यक्रम की सांस्कृतिक झलक भी दर्शनीय रही। गढ़वाल विश्वविद्यालय के एनएसएस इकाई के छात्र-छात्राओं ने पारंपरिक गढ़वाली,जौनसारी एवं कुमाऊनी परिधानों में उत्तराखंड की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का सजीव प्रदर्शन किया। इस दौरान मेरी संस्कृति मेरी पहचान थीम पर लोकगीतों और लोकनृत्यों ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर प्रो.जे.के.तिवारी,प्रो.राकेश नेगी,समाजसेवी भोपाल चौधरी,कमला गोयल,उमा जोशी सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन सेवा केंद्र की बहनों ने सरस और आध्यात्मिक वातावरण में किया। समापन सत्र में सभी प्रतिभागियों ने यह संकल्प लिया कि वे उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर,लोककला और आध्यात्मिक परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाने में अपना योगदान देंगे,ताकि मेरी संस्कृति मेरी पहचान का यह संदेश देवभूमि से विश्वभूमि तक गूंज उठे।

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