
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। भारतीय संस्कृति के अनन्य उपासक,युवाओं के शाश्वत प्रेरणास्रोत,विश्व मंच पर भारत की आध्यात्मिक चेतना का उद्घोष करने वाले महान संन्यासी,दार्शनिक और समाज सुधारक स्वामी विवेकानंद की जयंती आज राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में संपूर्ण राष्ट्र में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस अवसर पर समस्त युवा शक्ति को हार्दिक शुभकामनाएं एवं स्वामी विवेकानंद को कोटि-कोटि नमन। स्वामी विवेकानंद केवल एक संत या विचारक नहीं थे,बल्कि वे भारतीय युवाओं की आत्मा में छिपी शक्ति को पहचानने और उसे राष्ट्र निर्माण की दिशा देने वाले महापुरुष थे। भारत ही नहीं,बल्कि विश्व भर के युवाओं पर उनके विचारों का गहरा प्रभाव रहा है। वर्ष 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में दिया गया उनका ऐतिहासिक भाषण भारतीय दर्शन,संस्कृति और अध्यात्म की गौरवगाथा बन गया। उसी क्षण से स्वामी विवेकानंद भारतीय अध्यात्म के वैश्विक अग्रदूत के रूप में स्थापित हो गए। वर्तमान समय में जब युवा वर्ग तेजी से बदलती सामाजिक,आर्थिक और तकनीकी परिस्थितियों से जूझ रहा है,नए लक्ष्य निर्धारित कर रहा है और बेहतर भविष्य की आकांक्षा रखता है-ऐसे में स्वामी विवेकानंद के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। वे मानते थे कि जीवन केवल सफल होना ही नहीं,बल्कि सार्थक भी होना चाहिए,ताकि मस्तिष्क,हृदय और आत्मा-तीनों का समुचित विकास हो सके। स्वामी विवेकानंद के विचारों को मुख्यतः चार आयामों-शारीरिक,सामाजिक,बौद्धिक और आध्यात्मिक संधान-के रूप में समझा जा सकता है। स्वामी विवेकानंद का दृढ़ विश्वास था कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए युवा को शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त होना होगा। उनका प्रसिद्ध मंत्र-उठो,जागो और तब तक न रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए,आज भी युवाओं में नई ऊर्जा का संचार करता है। वे कहते थे-सारी शक्ति तुम्हारे भीतर है,स्वयं को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है। उनके अनुसार सशक्त शरीर में ही सशक्त विचार जन्म लेते हैं। विवेकानंद चाहते थे कि युवा अधिक से अधिक सामाजिक गतिविधियों से जुड़ें। उनका मानना था कि समाज सेवा केवल दायित्व नहीं,बल्कि आध्यात्मिक साधना भी है। उन्होंने मानव में विद्यमान ईश्वर की सेवा को ही सच्ची भक्ति बताया। समाज के कमजोर और वंचित वर्ग की सेवा करके ही सशक्त और समरस समाज का निर्माण संभव है। वे कहते थे-यदि सौ समर्पित,निष्ठावान और कर्मठ युवा खड़े हो जाएं,तो वे दुनिया में क्रांति ला सकते हैं। स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को केवल जानकारी का बोझ मानने से इनकार किया। उनके अनुसार शिक्षा वह है,जो चरित्र निर्माण करे,आत्मविश्वास जगाए और व्यक्ति को जीवन की चुनौतियों से जूझने योग्य बनाए। उन्होंने ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था की कल्पना की,जिसमें भौतिक और आध्यात्मिक शिक्षा का संतुलन हो और जो राष्ट्र के पुनर्निर्माण में सहायक बने। शिक्षा का उद्देश्य परोपकार,साहस और सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव उत्पन्न करना होना चाहिए। स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी सभ्यता की सकारात्मक बातों को स्वीकार किया,लेकिन भारतीय दर्शन और अध्यात्म को सर्वोच्च माना। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि आधुनिकता अपनाएं,पर अपनी आध्यात्मिक जड़ों से कभी न कटें। उनका कहना था कि आज पश्चिम का विचारशील युवा भारतीय अध्यात्म में शांति और उद्देश्य की खोज कर रहा है-वह भूख और प्यास जो भौतिक सुखों से नहीं मिटती,उसे अध्यात्म ही शांत कर सकता है। विवेकानंद का मानना था कि जीवन छोटा है,पर आत्मा अजर-अमर है। इसलिए जीवन को किसी बड़े लक्ष्य की प्राप्ति में समर्पित करना चाहिए। वे त्याग और सेवा को राष्ट्रीय चरित्र का अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उनके सपनों का भारत ऐसा था,जहां स्वतंत्रता,सम्मान,प्रेम,सेवा और शक्ति-सभी का समन्वय हो। स्वामी विवेकानंद केवल उपदेशक नहीं,बल्कि कर्मयोगी थे। उन्होंने जो कहा उसे अपने जीवन में उतारकर दिखाया। समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को उन्होंने अपना ईश्वर माना और आजीवन उनकी सेवा में लगे रहे। यही कारण है कि उनके विचार,आदर्श और लक्ष्य आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। आज का युवा यदि स्वामी विवेकानंद द्वारा बताए गए शारीरिक,सामाजिक,बौद्धिक या आध्यात्मिक-किसी एक मार्ग पर भी चल पड़े,तो वह न केवल व्यक्तिगत रूप से सफल होगा,बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा। यही स्वामी विवेकानंद को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।