हिमालय टाइम्स नरेंद्र सिंह/गबर सिंह भण्डारी
कीर्तिनगर/श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन की रीढ़ माने जाने वाले,जनपक्षधर राजनीति के दृढ़ स्वर और पूर्व कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट के निधन से पूरे प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई है। राज्य के विभिन्न जिलों,कस्बों,गांवों,विश्वविद्यालयों से लेकर राजनीतिक दलों,सामाजिक संगठनों और आम जनता तक हर कहीं श्रद्धांजलि सभाओं का क्रम जारी है। लेकिन इस गहरे सम्मान के बीच एक कड़वी विडंबना भी सामने आई है जिस कीर्तिनगर विकास खंड को उन्होंने अपने जीवन के 13 स्वर्णिम वर्ष दिए,वहीं उनके नाम पर एक औपचारिक श्रद्धांजलि तक आयोजित नहीं हुई। टिहरी जनपद के बड़ियारगढ़ क्षेत्र के सुपाड़ गांव में जन्मे दिवाकर भट्ट ने राज्य निर्माण आंदोलन को जिस ऊर्जा और दिशा दी,वह इतिहास का अविभाज्य हिस्सा है। उनका राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष कीर्तिनगर से ही शुरू हुआ। 1983 में पहली बार कीर्तिनगर ब्लॉक प्रमुख बने और 1983 से 1996 तक लगातार 13 वर्षों तक इस पद पर रहे जो स्वयं में ऐतिहासिक है। इन्हीं वर्षों में उन्होंने शिक्षा,सड़क,स्वास्थ्य,संगठन और आंदोलन की बुनियाद खड़ी की। कीर्तिनगर ब्लॉक का नाम प्रदेश के राजनीतिक नक्शे पर स्थापित हुआ तो उसका श्रेय बड़े हिस्से में दिवाकर भट्ट जैसे जननेता को जाता है। प्रदेशभर में जहां देहरादून,टिहरी,श्रीनगर,रुद्रप्रयाग,पौड़ी सहित अलग-अलग जनपदों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं,राज्य आंदोलनकारियों,पंचायत प्रतिनिधियों,विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की जा रही हैं,वहीं कीर्तिनगर ब्लॉक जो उनके नेतृत्व का केंद्र रहा-मौन है। स्थानीय लोगों में चर्चा का विषय बना कि जिस ब्लॉक के लिए उन्होंने संघर्ष की परिभाषा बदली,वहां से उन्हें श्रद्धांजलि के दो फूल तक नहीं मिले। क्या यही हमारे जननेताओं के प्रति सम्मान है। ब्लॉक मुख्यालय और स्थानीय प्रतिनिधियों की इस चुप्पी पर कई सवाल उठ रहे हैं। लोग मानते हैं कि जिस विकास खंड ने उन्हें उनके राजनीतिक जीवन का आधार दिया,वहां से अपेक्षित सम्मान न मिलना दुखद और अनुचित है। दिवाकर भट्ट को राज्य आंदोलन के दौरान उनके साहस,रणनीति और संगठन क्षमता के कारण कई लोग फील्ड मार्शल भट्ट कहा करते थे। उनकी अगुवाई में उग्र आंदोलनों,जुलूसों,धरनों और संघर्षों ने राज्य निर्माण की दिशा तय की। लेकिन आज उसी जनपद और उसी ब्लॉक से औपचारिक शोक-श्रद्धांजलि का अभाव यह संकेत देता है कि राजनीतिक समाज अपनी स्मृतियों के प्रति कितना असंवेदनशील होता जा रहा है। स्थानीय नागरिकों,राज्य आंदोलनकारियों और उनके जानने वालों का कहना है कि
दिवाकर भट्ट किसी दल,किसी पद या किसी चुनाव का नाम नहीं थे,वे पूरे आंदोलन और जनसंघर्ष का प्रतीक थे। लोगों का यह भी मानना है कि श्रद्धांजलि देने से कोई बड़ा या छोटा नहीं होता,यह परंपरा हमारे संस्कारों की पहचान है। कीर्तिनगर ब्लॉक की यह चुप्पी इतिहास याद रखेगा। दिवाकर भट्ट को पूरे उत्तराखंड ने अपना नेता माना,सम्मान दिया,श्रद्धांजलि दी। लेकिन जिस कीर्तिनगर ब्लॉक को उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का आधार और ऊर्जा दी,वहीं का मौन और उपेक्षा राजनीतिक संवेदनहीनता का कटु उदाहरण बनकर सामने आई है। एक जननेता का सम्मान केवल प्रदेश की सभाओं से नहीं होता,बल्कि उन लोगों से होता है जिन्हें उसने जीवनभर अपना परिवार माना। कीर्तिनगर की यह चुप्पी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सवाल छोड़ती है क्या हम अपने नायकों की कद्र केवल उनके न रहने पर ही करते हैं,या सच में उनके योगदान को हृदय से पहचानते हैं।