लोक-संस्कृति नाट्यकला और कविता की सुरमयी संध्या में डूबा श्रीक्षेत्र-बैकुंठ चतुर्दशी मेले की तीसरी शाम रही गैंडा वध नाट्य प्रस्तुति और गढ़वाली कवि सम्मेलन के नाम

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। ऐतिहासिक बैकुंठ चतुर्दशी मेला एवं विकास प्रदर्शनी की तीसरी संध्या श्रीनगर में लोकभाषा,लोक-संस्कृति और नाट्यकला के रंगों में सराबोर रही। देवभूमि की सांस्कृतिक धरोहर को समर्पित इस

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। ऐतिहासिक बैकुंठ चतुर्दशी मेला एवं विकास प्रदर्शनी की तीसरी संध्या श्रीनगर में लोकभाषा,लोक-संस्कृति और नाट्यकला के रंगों में सराबोर रही। देवभूमि की सांस्कृतिक धरोहर को समर्पित इस शाम में एक ओर जहां गैंडा वध जैसे पौराणिक नाट्य का सशक्त मंचन हुआ,वहीं दूसरी ओर गढ़वाली कवियों ने अपनी ओजस्वी रचनाओं से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर के कुलपति प्रो.श्रीप्रकाश सिंह और जिला पंचायत अध्यक्ष पौड़ी रचना बुटोला ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर मेयर आरती भण्डारी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए मेले की सांस्कृतिक रूपरेखा और आयोजन की महत्ता पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि प्रो.प्रकाश सिंह ने कहा ऐसे आयोजन हमारी लोक-संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम हैं,जो नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का कार्य करते हैं। मंच पर बच्छणस्यूं मंडाण समूह द्वारा प्रस्तुत गैंडा वध नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को पौराणिक युग में पहुंचा दिया। नाटक में पांडवों द्वारा अपने पिता पांडू के श्राद्ध के लिए गैंडे की खाल प्राप्त करने की कथा का सजीव चित्रण किया गया। नाट्य निर्देशन अंकित रावत और जसपाल गुसाईं ने किया,जबकि कलाकारों में लखपत राणा अर्जुन,ऋतिक नागार्जुन और आशुतोष रौथाण भीम के अभिनय को खूब सराहना मिली। संध्या में नटराज डांस ग्रुप श्रीनगर द्वारा दी गई आकर्षक नृत्य प्रस्तुति ने पूरे पंडाल को तालियों की गूंज से भर दिया। कार्यक्रम में नगर आयुक्त नूपुर वर्मा,शहर कोतवाल जे.एस.नेगी,नगर निगम पार्षदगण सहित बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित रहे। तीसरी संध्या का दूसरा प्रमुख आकर्षण रहा गढ़वाली कवि सम्मेलन,जिसने श्रोताओं के मन को झकझोर दिया। कार्यक्रम का संचालन कवि ओमप्रकाश सेमवाल रुद्रप्रयाग ने किया,जिन्होंने अपनी कविता त्वे मा नव निर्माण का हुनर छन से शुरुआत कर कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई। अनुसुईया बडोनी,अंशी कमल श्रीनगर ने सरस्वती वंदना से आरंभ कर गीत चल त्वे तैं मि सैर करौलु अपणा गढ़-कुमाऊ कि-के माध्यम से भाषा और भूमि का सुंदर मेल प्रस्तुत किया। कवि संदीप रावत ने अपनी भावनात्मक रचनाओं जब खुलदन कैकि जिंदगी का पन्ना और गढ़वाली गजल त्वे मिलणा कु जिंदगी तरसदि रै से सबका दिल जीत लिया। जय विशाल गढ़देशी कर्णप्रयाग की छड़छड़ी झपोड्यूं तेरी प्रीतै झौळ मा और जगदम्बा चमोला रुद्रप्रयाग की बचपन का दिन बि कन छा ने वातावरण को भावुक कर दिया। दार्शनिक दृष्टिकोण से मुरली दीवान नागनाथ पोखरी ने कहा मि स्थिर छौं कि गरिमान छौं कि गतिमान छौं,जबकि नरेन्द्र रयाल ऋषिकेश ने शिक्षा और विकास पर व्यंग्य करते हुए रचना बणै छौ प्रधान लिखै-पढ़ाई कि,कारला यो विकास पुल्ये-पतै कि से सबको सोचने पर विवश किया। महिला सशक्तिकरण की आवाज बनीं उपासना सेमवाल गुप्तकाशी अपनी कविता कागज-कलम उकरी जब ब्येटीन जब अपणा बारा मा लिखि अनीता काला श्रीनगर ने य माटी चंदन धरती स्वर्ग समान से मातृभूमि के गौरव का बखान किया। कुसुम भट्ट अगस्त्यमुनि ने विकास कि दौड़ मा अटगणू च मनखी सुनाकर आधुनिकता की अंधी दौड़ पर तीखा व्यंग्य किया। संस्कृति और सृजन का संगम बनी श्रीनगर की रजत संध्या,तीसरी संध्या का हर क्षण गढ़वाली अस्मिता,कला और काव्य से सराबोर रहा। जहां गैंडा वध ने पौराणिक इतिहास को सजीव किया,वहीं गढ़वाली कवि सम्मेलन ने भाषा और भावना का अमर संगम रचा। श्रीनगर का मेला परिसर देर रात तक तालियों,ठहाकों और जय बद्री-केदार के नारों से गूंजता रहा। मेले की यह सांस्कृतिक संध्या न केवल मनोरंजन का माध्यम बनी,बल्कि इसने एक बार फिर सिद्ध किया कि गढ़वाली संस्कृति और भाषा आज भी जीवंत है-जन-जन की आत्मा में बसती हुई।

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