
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। मानव जीवन में सुख-दुःख,संपन्नता और अभाव केवल भाग्य की देन नहीं,बल्कि पूर्व कर्मों और धर्म के पालन का प्रतिफल भी होते हैं। इसी गूढ़ सत्य को उजागर करती है यह प्रेरक कथा,जिसमें धर्म,सत्संग और सदाचार को जीवन का सर्वोच्च आधार बताया गया है। एक दिन धर्मपरायण और विवेकशील सुमना ने अपने पति सोमशर्मा से शांत भाव से कहा प्रियतम,जिस मनुष्य को जितना धन मिलना होता है,वह बिना अधिक परिश्रम के भी उतना प्राप्त कर लेता है और जब धन के जाने का समय आता है,तब कितनी ही रक्षा क्यों न की जाए,वह चला ही जाता है। इसलिए धन की चिंता त्यागकर धर्म का आश्रय लेना चाहिए। वास्तव में पुत्र,धन और सुख-सबकी प्राप्ति धर्म के पालन से ही होती है। सुमना ने आगे कहा कि जो मनुष्य मन,वाणी और कर्म से धर्म का आचरण करता है,उसके लिए संसार में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती। धर्माचरण से ही जीवन में स्थायी सुख और शांति का वास होता है। इसके पश्चात उसने धर्म के स्वरूप,उसके अंगों और महत्व का विस्तार से वर्णन किया। सुमना की गूढ़ बातों को सुनकर सोमशर्मा ने आश्चर्य से पूछा तुम्हें इन गहन विषयों का इतना ज्ञान कैसे हुआ,इस पर सुमना ने विनम्रता से कहा मेरे पिताजी धर्मात्मा,शास्त्रों के तत्वज्ञ और संतों का सम्मान करने वाले थे। वे स्वयं भी सत्संग किया करते थे और मुझे भी साथ ले जाया करते थे। उसी सत्संग के प्रभाव से मुझे धर्म का वास्तविक ज्ञान प्राप्त हुआ है। जब सोमशर्मा ने पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा तो सुमना ने उन्हें महामुनि वशिष्ठ की शरण में जाने की सलाह दी। पत्नी की प्रेरणा पाकर सोमशर्मा महामुनि वशिष्ठ के आश्रम पहुंचे और अपनी दरिद्रता व पुत्रहीनता का कारण जानना चाहा। महामुनि वशिष्ठ ने तपोबल से उनके पूर्व जन्म का रहस्य उजागर करते हुए कहा पूर्व जन्म में तुम अत्यंत लोभी थे। दूसरों से द्वेष रखते थे और कभी तीर्थयात्रा,देवपूजन,दान या श्राद्ध जैसे शुभ कर्म नहीं किए। धन ही तुम्हारा सर्वस्व था। अरबों-खरबों स्वर्ण मुद्राएं होने पर भी तुम्हारी तृष्णा समाप्त नहीं हुई। तुमने धन को भूमि में गाड़ दिया,किंतु पत्नी और पुत्र को उससे वंचित रखा। इन्हीं कर्मों के कारण इस जन्म में तुम्हें दरिद्रता और पुत्र-वियोग भोगना पड़ रहा है। किन्तु महामुनि ने यह भी कहा एक बार तुमने अतिथि रूप में आए एक विष्णुभक्त ब्राह्मण की श्रद्धा से सेवा की थी और पत्नी सहित एकादशी व्रत रखकर भगवान विष्णु का पूजन किया था। उसी पुण्य के फलस्वरूप तुम्हें उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म और सद्गुणी पत्नी प्राप्त हुई है। महामुनि वशिष्ठ ने उपदेश देते हुए कहा उत्तम स्त्री,पुत्र,कुल,राज्यसुख और अंततः मोक्ष जैसी दुर्लभ प्राप्तियां केवल भगवान विष्णु की कृपा से ही संभव हैं। अतः लोभ का त्याग कर धर्म के मार्ग पर चलो और भगवान विष्णु की शरण ग्रहण करो। यह कथा हमें यह शिक्षा देती है कि धन का अंधा लोभ मनुष्य को भीतर से खोखला कर देता है,जबकि धर्म,सत्संग और सदाचार जीवन को प्रकाशमान बनाते हैं। सच्चा सुख संग्रह में नहीं,बल्कि संयम और सेवा में निहित है।