विकास से मीलों दूर कीर्तिनगर क्षेत्र के सूमाड़ी समेत 7 गांवों की बदहाली पर बड़ा सवाल

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी कीर्तिनगर/टिहरी गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखण्ड के टिहरी जनपद में विकास के दावों की चमक भले ही कागजों और मंचों तक सीमित हो,लेकिन जमीनी हकीकत आज भी कई गांवों में दर्दनाक

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

कीर्तिनगर/टिहरी गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखण्ड के टिहरी जनपद में विकास के दावों की चमक भले ही कागजों और मंचों तक सीमित हो,लेकिन जमीनी हकीकत आज भी कई गांवों में दर्दनाक तस्वीर पेश कर रही है। विकास खण्ड कीर्तिनगर की पट्टी डागर का सुमाड़ी क्षेत्र इसका जीता-जागता उदाहरण बन चुका है,जहां आज भी लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि कीर्तिनगर तहसील और ब्लॉक मुख्यालय से महज 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह क्षेत्र आखिर आज भी विकास से कोसों दूर क्यों है,क्या सरकारी योजनाएं सिर्फ फाइलों में ही पूरी हो जाती हैं। सुमाड़ी,सैण,कोटी,जखेडाबाट,इंजर,डांग और सौड़ जैसे करीब आधा दर्जन गांव आज भी सड़क सुविधा से वंचित हैं। ग्रामीणों को रोजाना जखेड तक पहुंचने के लिए जान जोखिम में डालकर पैदल सफर करना पड़ता है। इस कठिन रास्ते का सबसे ज्यादा खामियाजा बीमार,बुजुर्ग और स्कूली बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिम्मेदार विभाग और जनप्रतिनिधि इस ओर से पूरी तरह आंखें मूंदे बैठे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि संपर्क मार्ग आज भी कच्चे हैं-न सीसी सड़क,न सुरक्षा के लिए रेलिंग और न ही रात के समय रोशनी के लिए सौर लाइट। यानी सुविधा और सुरक्षा दोनों का अभाव साफ झलकता है। सुमाड़ी में जो खंडजा मार्ग बन भी रहा है,वह इतनी खड़ी चढ़ाई वाला है कि उस पर चलना भी किसी चुनौती से कम नहीं। विडंबना यह है कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर यह क्षेत्र आज भी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। यहां के खेतों में केला,हल्दी,अदरक,अरबी और इलायची जैसी नगदी फसलें उगाई जाती हैं। यदि सड़क और बाजार की उचित व्यवस्था हो जाए,तो यही क्षेत्र आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकता है। लेकिन लचर व्यवस्था और प्रशासनिक उदासीनता ने लोगों को पलायन के लिए मजबूर कर दिया है। और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस क्षेत्र के कई युवा और बुजुर्ग देश-प्रदेश में महत्वपूर्ण सेवाओं में कार्यरत हैं-कोई सेना में देश की रक्षा कर रहा है,तो कोई शिक्षा और सरकारी सेवाओं में अपना योगदान दे रहा है। लेकिन उनके अपने गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। ग्रामीणों में हरी सिंह रावत,मदय सिंह रावत,चरण सिंह नेगी,सते सिंह रावत,अर्जुन सिंह नेगी,धन सिंह नेगी,मोहन सिंह नेगी,भगवान सिंह नेगी,गणेश सिंह नेगी,अनिता देवी,गीता देवी,भूमा देवी,सुनीता देवी,पुष्पा मैहर और पूर्णा देवी सहित कई लोगों ने सरकार और जनप्रतिनिधियों पर सीधा सवाल खड़ा किया है कि आखिर कब इस क्षेत्र की सुध ली जाएगी। स्थानीय निवासी मोहन सिंह रावत का कहना है कि विकास के नाम पर सिर्फ छल हुआ है। चुनाव के समय नेता घर-घर आते हैं,लेकिन जीतने के बाद न तो दिखाई देते हैं और न ही फोन उठाते हैं। स्थिति इतनी गंभीर है कि कई गांवों में आज भी मोबाइल नेटवर्क तक उपलब्ध नहीं है। आपात स्थिति में संपर्क करना तक मुश्किल हो जाता है,जो सीधे तौर पर लोगों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने साफ चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही सड़क,संचार और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए,तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे। सवाल अब भी वहीं खड़ा है कि क्या सुमाड़ी और आसपास के गांवों के लोग सिर्फ चुनावी आंकड़े हैं,या उन्हें भी विकास का समान अधिकार मिलेगा और आखिर कब जागेगा सिस्टम।

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