शिक्षा का बदलाव स्वरूप-वैदिक संस्कारों से आधुनिक तकनीक तक,समाज के आईने में शिक्षा की तस्वीर

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। साहित्य समाज का दर्पण है यह कहावत केवल शब्दों तक सीमित नहीं,बल्कि शिक्षा और समाज के गहरे संबंधों को भी उजागर करती है। जिस प्रकार समाज का

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। साहित्य समाज का दर्पण है यह कहावत केवल शब्दों तक सीमित नहीं,बल्कि शिक्षा और समाज के गहरे संबंधों को भी उजागर करती है। जिस प्रकार समाज का स्वरूप बदलता है,उसी के अनुरूप शिक्षा की दिशा और दशा भी परिवर्तित होती रहती है। यही शिक्षा आगे चलकर समाज के निर्माण की आधारशिला बनती है। राजकीय इंटर कॉलेज मरखोड़ा-खिर्सू,पौड़ी गढ़वाल के अध्यापक मनोज काला ने शिक्षा के ऐतिहासिक विकास और उसके सामाजिक प्रभावों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा का स्वरूप सदैव समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप परिवर्तित होता रहा है। वैदिक काल में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं,बल्कि व्यक्ति के चरित्र,संस्कार और अनुशासन का निर्माण था। गुरुकुल प्रणाली के अंतर्गत विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रहकर जीवनोपयोगी शिक्षा प्राप्त करते थे। वेद,उपनिषद,योग,दर्शन और युद्ध-कला जैसे विषयों का अध्ययन कराया जाता था। इस काल में गुरु-शिष्य संबंध अत्यंत पवित्र और सशक्त हुआ करता था। मध्यकाल: अस्थिरता के बीच धार्मिक शिक्षा का वर्चस्व मध्यकालीन भारत में विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता के कारण शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हुई। इस दौर में लोगों ने अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा को प्राथमिकता दी,जिससे शिक्षा में धार्मिकता का प्रभाव बढ़ गया। हिंदुओं के लिए पाठशालाएं और मुसलमानों के लिए मदरसे स्थापित हुए,जहां संस्कृत,अरबी और फारसी भाषाओं पर विशेष जोर रहा। ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा में एक बड़ा बदलाव आया। अंग्रेजों ने आधुनिक शिक्षा प्रणाली की शुरुआत की,जिसमें अंग्रेजी भाषा,विज्ञान,गणित और प्रशासनिक विषयों को प्राथमिकता दी गई। हालांकि इसका उद्देश्य शासन के लिए कर्मचारी तैयार करना था,लेकिन इसी के साथ एक नए शिक्षित वर्ग का उदय भी हुआ। इसके परिणामस्वरूप भारतीय पारंपरिक शिक्षा प्रणाली कमजोर पड़ने लगी। वर्तमान दौर: तकनीक,कौशल और वैश्विक दृष्टिकोण आज की शिक्षा प्रणाली तकनीकी और व्यावसायिक दृष्टिकोण से प्रेरित है। डिजिटल शिक्षा,ऑनलाइन क्लास,स्मार्ट कक्षाएं और ई-लर्निंग जैसे आधुनिक माध्यमों ने शिक्षा को नई दिशा दी है। अब शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं बल्कि व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास और सामाजिक जिम्मेदारी भी है। सरकार द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाना,सर्व शिक्षा अभियान और मध्यान्ह भोजन योजना जैसी पहल इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं,जिनसे शिक्षा का प्रसार समाज के हर वर्ग तक पहुंचा है। मनोज काला ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में तकनीकी और कौशल आधारित ज्ञान पर अत्यधिक जोर के कारण पारंपरिक मूल्य,संस्कार और चरित्र निर्माण की भावना कहीं न कहीं कमजोर पड़ती जा रही है। इसका प्रभाव समाज में बढ़ते अपराध,नशाखोरी और उपभोक्तावाद के रूप में देखने को मिल रहा है। निष्कर्ष: संतुलित शिक्षा ही मजबूत समाज की कुंजी अंततः यह स्पष्ट है कि शिक्षा का स्वरूप वैदिक काल की आध्यात्मिकता से लेकर आधुनिक युग की वैज्ञानिकता और तकनीकी उन्नति तक निरंतर विकसित हुआ है। परंतु आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक कौशल और रोजगार आधारित शिक्षा के साथ-साथ नैतिकता,संस्कार और चरित्र निर्माण को भी समान महत्व दिया जाए। तभी शिक्षा अपने मूल उद्देश्य-मानव का सर्वांगीण विकास और एक स्वस्थ,सशक्त समाज का निर्माण को साकार कर सकेगी।

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