
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल/पौड़ी। देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत अपनी सादगी,आत्मीयता और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के कारण सदियों से विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। यहां के रीति-रिवाज केवल परंपरा नहीं,बल्कि सामाजिक एकता,धार्मिक आस्था और पारिवारिक मूल्यों का सशक्त आधार हैं। आधुनिकता के इस दौर में भी पहाड़ की ये परंपराएं आज भी उसी गरिमा और श्रद्धा के साथ जीवित हैं। हर शुभ अवसर शादी-विवाह,मुंडन संस्कार,जन्मोत्सव या कोई अन्य मांगलिक कार्य में उड़द की दाल के पकौड़े बनाना एक अनिवार्य और शुभ परंपरा मानी जाती है। यह केवल खानपान का हिस्सा नहीं,बल्कि इसे मंगल,समृद्धि और देव आशीर्वाद का प्रतीक समझा जाता है। पारंपरिक तौर पर महिलाएं मिलकर उड़द की दाल को भिगोकर सिल-बट्टे या में पीसते हैं,जिससे इस प्रक्रिया में सामूहिक श्रम और सहयोग की भावना भी झलकती है। पकौड़े बनने के बाद गांव का माहौल एक छोटे से उत्सव में बदल जाता है। महिलाएं,युवा और बुजुर्ग एक साथ बैठकर चाय के साथ इन पकौड़ों का आनंद लेते हैं। यह केवल भोजन नहीं,बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप,संवाद और रिश्तों को मजबूत करने का एक माध्यम बन जाता है। घर आए मेहमानों के लिए भी चाय और पकौड़ों से स्वागत करना यहां की पारंपरिक आतिथ्य संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है,जो अतिथि देवो भवः की भावना को जीवंत करता है। इन परंपराओं में प्रकृति के प्रति सम्मान भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। नजदीकी गांवों में आज भी निमंत्रण देने के लिए मालू के पत्तों में लिपटी डल्ली दी जाती है,जो आधुनिक निमंत्रण कार्ड का स्थान लेती है। इस डल्ली में पारंपरिक रूप से पकौड़े या अन्य स्थानीय खाद्य सामग्री रखकर आमंत्रण दिया जाता है। यह केवल निमंत्रण नहीं बल्कि भावनात्मक जुड़ाव,अपनत्व और सामाजिक रिश्तों की मिठास का प्रतीक है। विशेष बात यह है कि डल्ली देने की परंपरा में पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी निहित है,क्योंकि इसमें प्लास्टिक या कागज का प्रयोग नहीं होता,बल्कि पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जाता है। यह दर्शाता है कि पहाड़ का समाज सदियों पहले से ही प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की कला जानता था। बुजुर्गों के अनुसार इन परंपराओं का उद्देश्य केवल रीति निभाना नहीं,बल्कि समाज में एकता,सहयोग और संस्कारों को जीवित रखना है। नई पीढ़ी भी इन परंपराओं को अपनाकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हुई है,जो उत्तराखंड की पहचान को और मजबूत बनाता है। देवभूमि की ये परंपराएं यह संदेश देती हैं कि सच्ची समृद्धि आधुनिक साधनों में नहीं,बल्कि अपनी संस्कृति,प्रकृति और आपसी रिश्तों को संजोकर रखने में निहित है।