संस्कृत के उद्भट विद्वान थे उत्तराखंड के शिवप्रसाद भारद्वाज

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी देवप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर में उत्तराखंड के प्रसिद्ध संस्कृतज्ञ आचार्य शिवप्रसाद भारद्वाज के संस्कृत के क्षेत्र में दिये गये योगदान का विवेचन किया गया।

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

देवप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर में उत्तराखंड के प्रसिद्ध संस्कृतज्ञ आचार्य शिवप्रसाद भारद्वाज के संस्कृत के क्षेत्र में दिये गये योगदान का विवेचन किया गया। विद्वानों ने कहा कि आचार्य भारद्वाज ने संस्कृत में अनेक विधाओं पर कार्य किया। वे हिंदी के भी विद्वान लेखक थे। 50 से अधिक ग्रंथों की रचना कर वे संस्कृत के रचना संसार में अपना अप्रतिम स्थान बना गये हैं। आचार्य शिव प्रसाद के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में साहित्य अकादमी और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के तत्वावधान में आयोजित दो राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि साहित्य अकादमी संस्कृत परामर्श मंडल के संयोजक प्रो.हरेकृष्ण सतपथी ने कहा कि आचार्य भारद्वाज उत्तराखंड के संस्कृत के उद्भट विद्वान थे,जिन्होंने काव्य,रूपक,उपन्यास,कथा,निबंध,समीक्षा,जीवन चरित इत्यादि विषयों पर व्यापक लेखन किया। हिंदी में भी उन्होंने अनेक रचनाएं लिखीं। इस हिमालय पुत्र का लेखन हिमालय जैसा विराट था। प्रो.सतपथी ने कहा कि इस देवभूमि उत्तराखंड ने संस्कृत और हिंदी के अनेक विद्वान दिये हैं। उत्तराखंड में साहित्य अकादमी की यह संगोष्ठी संस्कृत साहित्य के लिए महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जगद्गुरु शंकराचार्य,कालिदास और सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे तीन महापुरुषों ने भारत की अखंडता के लिए बड़ा योगदान दिया है। शंकराचार्य ने चार पवित्र धामों की स्थापना की,कालिदास ने संस्कृत साहित्य में संपूर्ण भारत की नैसर्गिकता को समाहित किया और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने राजनीतिक रूप से भारत को सुदृढ़ किया है। इसी प्रकार केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भारत में फैले विभिन्न परिसरों के माध्यम से संस्कृत के शिक्षण और जनकल्याण और सामाजिक कार्यों से भारत की अखंडता और एकता में योगदान दे रहा है। उन्होंने कहा कि संस्कृत पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोती है। संस्कृत भारतीयता का पर्याय है। यह भारत की आत्मा है। बीज भाषण में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर परिसर के निदेशक प्रो.रमाकांत पांडेय ने आचार्य भारद्वाज की साहित्य संपदा की समीक्षा करते हुए कहा कि पौड़ी गढ़वाल डांग गांव के मूल निवासी आचार्य शिव प्रसाद ने अपनी साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से अनेक विषयों को स्पर्श किया है। उनकी रचनाओं में उनकी गहरी संवेदनाओं के दर्शन होते हैं। उनका साहित्य भारतीय जनजीवन का वास्तविक रूप प्रकट करता है। साहित्य अकादमी के उपसचिव डॉ.एन.सुरेश बाबू ने कहा कि इस संगोष्ठी की संस्कृत साहित्य के विद्यार्थियों,शोधार्थियों और विद्वानों के लिए बहुत बड़ी उपादेयता होगी। अध्यक्षीय उद्बोधन में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर के निदेशक प्रो.पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने कहा कि देवप्रयाग बहुत पहले से ही संस्कृत विद्वानों का क्षेत्र रहा है। उत्तराखंड के देवप्रयाग जैसे तीर्थ में इस साहित्यिक विवेचना का होना स्वयं में महत्त्वपूर्ण है। सह निदेशिका चंद्रकला आर.कोंडी ने भी विचार व्यक्त किये। धन्यवाद ज्ञापन डॉ.अनिल कुमार ने किया। इस अवसर पर साहित्य विभाग के शोधपत्र संग्रह गीतामृतधारा तथा दो प्रसूनों (पुस्तकों)-राजनीति विमर्श और साहित्यशास्त्र विमर्श का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर डॉ.शैलेंद्र नारायण कोटियाल,डॉ.सुरेश शर्मा,डॉ.रितेशा,डॉ.ब्रह्मानंद मिश्रा,डॉ.वीरेंद्र सिंह बर्त्वाल,डॉ.दिनेशचंद्र पांडेय,डॉ.सुमिति सैनी आदि उपस्थित थे। उधर संगोष्ठी के चार सत्रों में विभिन्न संस्थानों से आये विद्वानों ने आचार्य शिव प्रसाद भारद्वाज के साहित्य पर केंद्रित शोध पढ़े। शोधपत्र वाचकों में डॉ.वीरेंद्र सिंह बर्त्वाल,डॉ.शैलेंद्र नारायण कोटियाल,डॉ.अनीता,डॉ.दीपक कोठारी,डॉ.सुनीता आर्या,डॉ.रामविनय सिंह,डॉ.भारतेंदु पांडेय,डॉ.श्वेतपद्मा सतपथी,डॉ.नीरजकुमार जोशी,प्रो.विजयपाल शास्त्री,डॉ.कंचन तिवारी,डॉ.दिनेश चंद्र पांडेय,डॉ.प्रकाष चंद्र जांगी आदि शामिल थे। विशेषज्ञों में डॉ.वनमाली विश्वाल इत्यादि इस कार्यक्रम में उपस्थित रहे। समापन सत्र में प्रो.हरेकृष्ण सतपथी ने कहा कि इन शोधपत्रों को गंथों के रूप में प्रकाशित किया जाएगा। इसकी जिम्मेदारी इस कार्यक्रम के संयोजक डॉ.अनिल कुमार को दी गयी है।

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