
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड में महिला खेलों को लेकर वर्षों पहले दिया गया नारा ‘खेलेगी मां तो सीखेंगे बच्चे’ आज जमीन पर सच साबित होता दिख रहा है। श्रीनगर क्षेत्र के उफल्डा में आयोजित महिला क्रिकेट टूर्नामेंट (सीजन-2) न केवल खेल प्रतियोगिता है,बल्कि यह सामाजिक सोच में आए ऐतिहासिक बदलाव का जीवंत प्रमाण बन गया है। इस टूर्नामेंट में 16 महिला टीमों ने प्रतिभाग किया,जिनमें से शानदार प्रदर्शन के आधार पर अंतिम चार में जगह बनाने वाली टीमें-तहलका टीम उफल्डा,एचएनबी श्रीनगर,चंद्रवनी डांगचौरा और कीर्तिनगर टशकी हैं। मैदान में इन टीमों का उत्साह,रणनीति और अनुशासन यह साबित करता है कि क्रिकेट अब केवल युवाओं का खेल नहीं रहा,बल्कि उम्रदराज महिलाएं भी पूरे आत्मविश्वास के साथ खेल में परचम लहरा रही हैं। क्रिकेट के मैदान में महिलाओं की बैटिंग,बॉलिंग और क्षेत्ररक्षण किसी भी मायने में कमजोर नहीं दिखता। खेल को लेकर उनकी समझ,रणनीतिक सोच और फिटनेस दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। मैदान के बाहर बैठा हर दर्शक इस बदलाव को देखकर गर्व महसूस कर रहा है। महिला क्रिकेट टूर्नामेंट के आयोजक सुरेंद्र खत्री ने कहा कि गढ़वाल ही नहीं,बल्कि पूरे उत्तराखंड में माध्यमिक वर्ग की बालिकाओं और महिलाओं के लिए क्रिकेट टूर्नामेंट की नींव ढाई दशक पहले सामाजिक कार्यकर्ता एवं खेल प्रेरक देवेन्द्र गौड़ ने रखी थी। उस दौर में जब महिलाओं का खेल के मैदान में उतरना सामाजिक रूप से सहज नहीं था,तब देवेन्द्र गौड़ को शायद ताने भी सुनने पड़े होंगे। लेकिन आज वही बीज एक विशाल वृक्ष बन चुका है। कभी आलोचना करने वाले भी अब महिला क्रिकेट के कायल हैं और पूरा समाज देवेन्द्र गौड़ की दूरदर्शी सोच की सराहना करते हुए तालियां बजा रहा है। उफल्डा के आयोजन मंडल की भी सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। खिलाड़ियों की जुबानी-खेल से बदली जिंदगी हरफनमौला खिलाड़ी शोभा नेगी का कहना है कि वे बीते एक दशक से क्रिकेट,वॉलीबॉल सहित विभिन्न खेलों में लगातार प्रतिभाग कर रही हैं। खेल के मैदान में उतरकर उन्हें अपने जीवन के वे पल याद आ जाते हैं जो दशकों पहले पीछे छूट गए थे। उन्होंने कहा अगर चार दशक पहले देवेन्द्र गौड़ जैसे सकारात्मक सोच वाले लोग समाज को मिले होते,तो पहाड़ की बेटियां आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों के माध्यम से देश का नाम रोशन कर रही होतीं। फिर भी आने वाला समय बेटियों के लिए सुनहरा है। चालीस बसंत पार कर चुकी रजनी नेगी कहती हैं कि आज वे अपने बच्चों के साथ हर शाम खेल के मैदान में नजर आती हैं,लेकिन पहले ऐसा संभव नहीं था। शादी के बाद महिलाएं घर-परिवार और चौका-चूल्हे तक सीमित रह जाती थी और छात्र जीवन में खेले गए खेल पूरी तरह भूल जाते थे। उन्होंने कहा कि डेढ़ दशक पहले देवेन्द्र गौड़ ने महिलाओं और बालिकाओं के उत्थान के लिए जो अलख जगाई,उसी का परिणाम है कि आज शादीशुदा और उम्रदराज महिलाएं भी मैदान में उतरकर उत्तराखंड का नाम रोशन कर रही हैं। खिलाड़ी कीर्ति पांडे बताती हैं कि वे लंबे समय से क्रिकेट,वॉलीबॉल,खो-खो जैसे खेलों में हिस्सा ले रही हैं। खेल से उन्हें न केवल शारीरिक स्वास्थ्य मिलता है,बल्कि मानसिक सुकून भी मिलता है। उन्होंने कहा शादी के बाद जिन खेलों की केवल यादें रह गई थी,देवेन्द्र गौड़ जैसे व्यक्तित्व ने हमारे जीवन में दोबारा बचपन लौटा दिया। यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। आज हम पूरे उत्तराखंड में अलग-अलग स्थानों पर खेलों में हिस्सा ले रही हैं। उफल्डा में चल रहा यह महिला क्रिकेट टूर्नामेंट केवल एक प्रतियोगिता नहीं,बल्कि सामाजिक बदलाव,महिला सशक्तिकरण और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन गया है। यह सचमुच साबित कर रहा है कि जब मां मैदान में उतरेगी,तो बच्चे भी खेल और जीवन दोनों में आगे बढ़ेंगे।