
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
कीर्तिनगर/श्रीनगर गढ़वाल।
जनपद टिहरी गढ़वाल की कीर्तिनगर तहसील से एक गंभीर मामला सामने आया है,जिसने सरकारी तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला काश्तकार की भूमि पर बिना अनुमति रेलवे द्वारा डंपिंग किए जाने और उसके बाद हुई कथित विवादास्पद जांच से जुड़ा है,जिसमें शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच प्रक्रिया में न केवल तथ्यों को नजरअंदाज किया गया,बल्कि उनकी लगभग 5 नाली भूमि ही गायब कर दी गई। प्राप्त जानकारी के अनुसार,रेलवे विभाग द्वारा सुरंग निर्माण के दौरान निकली मिट्टी को संबंधित काश्तकार की भूमि पर बिना पूर्व सूचना और अनुमति के डंप कर दिया गया। इस कार्रवाई से प्रभावित काश्तकार ने अपनी शिकायत मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर दर्ज कराई,ताकि निष्पक्ष जांच हो सके और न्याय मिल सके। हालांकि आरोप है कि जांच के नाम पर राजस्व उपनिरीक्षक मलेथा द्वारा जो आख्या प्रस्तुत की गई,वह कई सवालों को जन्म देती है। प्रारंभिक रिपोर्ट में यह दर्शाया गया कि सहखाताधारक की अनुमति से डंपिंग की गई,लेकिन जब अन्य अंशधारकों से अनुमति न लेने का प्रश्न उठा,तो एक नई और विवादास्पद रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड कर दी गई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इस दूसरी रिपोर्ट में न केवल उनके खेत का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया,बल्कि खाते के अंशों में से लगभग 5 नाली भूमि को ही गायब दिखा दिया गया। इतना ही नहीं,रिपोर्ट में शिकायतकर्ता के नाम पर एक मकान भी दर्शा दिया गया,जिसे उनके अनुसार उनके पिता ने कभी बनाया ही नहीं था। विवाद को और गहराता हुआ बताते हुए शिकायतकर्ता ने कहा कि राजस्व उपनिरीक्षक ने अपनी जांच में भौगोलिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए खेत को दरियाबुर्द (नदी में बहा हुआ) बताया,जबकि वास्तविकता यह है कि आपदा के बाद भी वह भूमि खेती योग्य रही और उस पर लगातार कृषि कार्य होता रहा। जब इस संबंध में राजस्व उपनिरीक्षक से संपर्क करने का प्रयास किया गया,तो उन्होंने शिकायतकर्ता की बात सुनने से ही इंकार कर दिया,जिससे पीड़ित पक्ष की नाराजगी और बढ़ गई। इसके बाद शिकायतकर्ता ने मामले को लेकर तहसीलदार और उपजिलाधिकारी से भी शिकायत की,लेकिन उनका आरोप है कि पूरा विभाग संबंधित कर्मचारी को बचाने में जुटा है और मामले की लीपापोती की जा रही है। पीड़ित काश्तकार का कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष रूप से,स्थलीय निरीक्षण के आधार पर और सभी पक्षों को सुनकर की जाती,तो इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न नहीं होती। उन्होंने संबंधित राजस्व उपनिरीक्षक के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि ऐसे मामलों से न केवल विभाग की साख पर असर पड़ता है,बल्कि आम नागरिकों को मानसिक और सामाजिक रूप से भी परेशान होना पड़ता है। यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या आम जनता के लिए बनाई गई शिकायत निवारण प्रणाली वास्तव में प्रभावी है,या फिर यह केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर प्रकरण में क्या रुख अपनाता है और पीड़ित को न्याय कब तक मिल पाता है।