
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। पहाड़ की धरती पर पेड़-पौधों को केवल हरियाली का प्रतीक नहीं,बल्कि जीवन,संस्कार और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जनपद पौड़ी गढ़वाल के विकास खण्ड पौड़ी पट्टी पैडुलस्यूं के ग्राम महलगांव निवासी पंकज नेगी ने भारतीय नौसेना से सेवानिवृत्ति के अवसर को अनूठे अंदाज में यादगार बना दिया। उन्होंने अपने घर के आंगन में जामुन का समलौण पौधा रोपकर न केवल अपनी सेवानिवृत्ति की स्मृतियों को प्रकृति से जोड़ा,बल्कि समाज को पर्यावरण संरक्षण का प्रेरणादायी संदेश भी दिया। पंकज नेगी ग्राम महलगांव निवासी पदम सिंह नेगी एवं शकुंतला देवी के पुत्र हैं। वर्षों तक देश की सेवा करने के बाद सेवानिवृत्ति के इस महत्वपूर्ण पड़ाव को उन्होंने किसी भौतिक आयोजन के बजाय प्रकृति को समर्पित किया। उनके इस कदम में पहाड़ की उस लोक परंपरा की झलक दिखाई दी,जिसमें जीवन के महत्वपूर्ण अवसरों और संस्कारों को प्रकृति के साथ जोड़कर उन्हें स्थायी स्मृति का रूप दिया जाता है। समलौण के रूप में रोपे गए जामुन के पौधे की देखभाल और संरक्षण की जिम्मेदारी पंकज नेगी की धर्मपत्नी नीलम देवी ने ली। पौधे की जिम्मेदारी परिवार की ओर से स्वीकार करना इस बात का प्रतीक है कि पौधारोपण केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं,बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक चलने वाला भावनात्मक संकल्प है। समलौण बना संस्कार और संस्कृति का हिस्सा कार्यक्रम का संचालन समलौण सेना नायिका हेमलता जोशी ने किया। उन्होंने समलौण परंपरा के सामाजिक,सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि आधुनिक जीवनशैली के बीच मनुष्य का प्रकृति के प्रति भावनात्मक लगाव लगातार कम होता जा रहा है। जंगलों का घटता क्षेत्र और पर्यावरण प्रदूषण आज पूरी मानव जाति के सामने गंभीर चुनौती बन चुका है। उन्होंने कहा कि वनों की कमी के कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है और पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित हो रहा है। ऐसे समय में समलौण जैसी लोक पहल केवल पौधारोपण तक सीमित नहीं,बल्कि प्रकृति के साथ भावनात्मक रिश्ता स्थापित करने वाली सामाजिक परंपरा बन रही है। हेमलता जोशी ने कहा कि समलौण के माध्यम से जीवन के विभिन्न संस्कारों,पर्वों और महत्वपूर्ण अवसरों को पौधारोपण से जोड़ा जा रहा है। जब किसी व्यक्ति के जीवन की खुशी,उपलब्धि या संस्कार की स्मृति किसी पौधे से जुड़ती है तो परिवार उस पौधे को केवल पेड़ नहीं,बल्कि अपने जीवन का हिस्सा मानकर उसकी देखभाल करता है। यही भाव पौधों के संरक्षण को मजबूत आधार प्रदान करता है। समलौण के तहत रोपा गया जामुन का पौधा आने वाले वर्षों में पंकज नेगी के जीवन की महत्वपूर्ण स्मृति का जीवंत प्रतीक बनेगा। आज रोपा गया यह छोटा पौधा जब विशाल वृक्ष का रूप लेगा तो उसकी छांव में आने वाली पीढ़ियां भी उस दिन को याद करेंगी,जब देशसेवा से सेवानिवृत्त होकर एक व्यक्ति ने अपनी खुशी को प्रकृति के नाम समर्पित किया था। यह पहल सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। सेवानिवृत्ति जैसे व्यक्तिगत अवसर को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर पंकज नेगी ने समाज के सामने यह संदेश रखा कि जीवन की खुशियां केवल स्वयं तक सीमित रखने के बजाय प्रकृति और समाज के साथ साझा की जाएं तो उनका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। उन्होंने क्षेत्रवासियों से भी अधिक से अधिक पौधे लगाने और रोपे गए पौधों की नियमित देखभाल करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है,बल्कि उन्हें वृक्ष बनने तक संरक्षित करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। इस अवसर पर गांव की समलौण सेना की सदस्य कबूतरी देवी,सरोजनी देवी,भारती देवी,कुश महादेवी,दोपा देवी,शकुंतला देवी,यशोदा देवी,बागेश्वरी देवी सहित अनेक ग्रामीण उपस्थित रहे। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने कार्यक्रम को सामाजिक और सामुदायिक स्वरूप प्रदान किया। समलौण की यह पहल पहाड़ की उस समृद्ध संस्कृति को भी प्रतिबिंबित करती है,जिसमें प्रकृति को केवल संसाधन नहीं बल्कि मां,जीवनदायिनी और भावी पीढ़ियों की धरोहर के रूप में सम्मान दिया जाता है। धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्कारों से जुड़ी इस भावना को पर्यावरण संरक्षण के साथ जोड़कर समलौण अभियान समाज में नई चेतना पैदा कर रहा है। पंकज नेगी की सेवानिवृत्ति के अवसर पर रोपा गया जामुन का यह पौधा अब उनके परिवार के लिए केवल एक पेड़ नहीं रहेगा,बल्कि देशसेवा,परिवार,प्रकृति और पहाड़ की संस्कृति के बीच जुड़ी एक जीवंत स्मृति के रूप में आने वाले वर्षों तक फलता-फूलता रहेगा।