
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। गढ़वाल की लोक-संस्कृति,भाषा और परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाने के संकल्प के साथ आयोजित दो दिवसीय (28-29 मार्च 2026) एकेश्वर-दंगलेश्वर अष्ट पजल यात्रा केवल एक सांस्कृतिक यात्रा नहीं,बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का एक जीवंत आंदोलन बनकर उभरी। हजार ग्राम,हजार धाम-हमरी भाषा,हमरी पछ्याण के संदेश को आत्मसात करते हुए पजल सम्राट जगमोहन सिंह रावत जगमोरा के नेतृत्व में यह 8 वीं द्योभूमि अष्ट पजल धाम यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न हुई। इस अनूठी यात्रा में सुशील बुड़ाकोटी शैलांचली,जयपाल सिंह रावत,दीवान सिंह नेगी,नागेंद्र सिंह रावत और भूपेंद्र सिंह बिष्ट जैसे साहित्य,संस्कृति और समाज से जुड़े लोग सहभागी बने,जबकि विनोद गौड़ ने सारथी की भूमिका निभाते हुए यात्रा को निरंतर गति दी। यह यात्रा केवल स्थानों का भ्रमण नहीं,बल्कि लोकजीवन,परंपराओं,लोकगीतों और पजल (पहेलियों) के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना का विस्तार थी। यात्रा का शुभारंभ एकेश्वर स्थित इगासर महादेव मंदिर से हुआ,जहां विधिवत पूजा-अर्चना के साथ पजल पाठ कर यात्रा को आध्यात्मिक ऊर्जा मिली। इसके बाद यात्रा का कारवां श्री गुरु राम राय पब्लिक स्कूल एकेश्वर पहुंचा,जहां विद्यार्थियों और शिक्षकों ने पारंपरिक अंदाज में भव्य स्वागत किया। छात्र-छात्राओं द्वारा गढ़वाली सरस्वती वंदना,कविता,गीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने वातावरण को लोकमय बना दिया। यहां वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह यात्रा केवल परंपरा का प्रदर्शन नहीं,बल्कि अपनी मातृभाषा,लोकसंस्कृति और साहित्य के संरक्षण का सशक्त प्रयास है। पजल के माध्यम से ज्ञान,हास्य और जीवन दर्शन को जोड़ने की यह परंपरा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। यात्रा के प्रमुख पड़ावों में इगासर महादेव,जण्दा देवी,क्वीई गांव (चौबट्टाखाल),पाली पोखरखाल (देवराजखाल),ज्वाल्पा देवी मंदिर,ग्रीन पब्लिक स्कूल सतपुली और दंगलेश्वर महादेव शामिल रहे। प्रत्येक स्थल पर पजल पाठ,लोकगीत,सांस्कृतिक संवाद और परंपरागत प्रसाद वितरण के माध्यम से एक अद्भुत सांस्कृतिक वातावरण बना। जण्दा देवी धाम में आस्था और इतिहास का संगम देखने को मिला,जहां तीलू रौतेली और लोकदेवियों की गाथाओं ने श्रद्धा का भाव और गहरा कर दिया। वहीं क्वीई गांव में ग्रामीणों की आत्मीयता और फूलदेई परंपरा के साथ हुआ स्वागत इस यात्रा की आत्मा बन गया। यात्रा के दौरान चौबट्टाखाल और देवराजखाल क्षेत्र में लोकसंस्कृति,पलायन,जल-जंगल-जमीन के संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसे ज्वलंत मुद्दों पर भी गंभीर चर्चा हुई। यह यात्रा केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं,बल्कि सामाजिक जागरूकता का मंच भी साबित हुई। पाली पोखरखाल स्थित आनंदवर्षा रिजॉर्ट में आयोजित सांस्कृतिक संध्या में लोकगीत,मांगल,थड़िया और चौंफला ने माहौल को जीवंत कर दिया। यहां स्थानीय जनप्रतिनिधियों,समाजसेवियों और ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी ने इस आयोजन को जनआंदोलन का रूप दे दिया। यात्रा का समापन सतपुली स्थित ग्रीन पब्लिक स्कूल में हुआ,जहां विद्यार्थियों ने रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत कर संस्कृति के प्रति अपनी जागरूकता का परिचय दिया। इस अवसर पर छात्रों को प्रोत्साहन स्वरूप प्रशस्ति पत्र और पॉकेट डिक्शनरी भेंट की गई जो इस यात्रा के शैक्षिक पक्ष को भी उजागर करता है। यह अष्ट पजल यात्रा केवल दो दिनों तक सीमित नहीं रही,बल्कि यह एक निरंतर चलने वाला सांस्कृतिक अभियान है जो आने वाले समय में और भी व्यापक रूप लेगा। जगमोरा और उनके साथियों का यह प्रयास यह संदेश देता है कि यदि अपनी भाषा,संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखना है तो उन्हें केवल पुस्तकों में नहीं बल्कि जनजीवन में उतारना होगा। निस्संदेह एकेश्वर-दंगलेश्वर अष्ट पजल यात्रा गढ़वाल की सांस्कृतिक धरोहर को संजोने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक पहल बनकर सामने आई है।