हिन्दू नववर्ष विक्रम संवत 2083 का भव्य स्वागत-श्रीनगर में आस्था,संस्कृति और एकता की विराट झांकियों ने रचा इतिहास

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि की ऐतिहासिक सांस्कृतिक और धार्मिक नगरी श्रीनगर में हिन्दू नववर्ष विक्रम संवत 2083 का आगमन अद्भुत आस्था,उल्लास और सांस्कृतिक वैभव के साथ हुआ। गुरुवार 19 मार्च

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि की ऐतिहासिक सांस्कृतिक और धार्मिक नगरी श्रीनगर में हिन्दू नववर्ष विक्रम संवत 2083 का आगमन अद्भुत आस्था,उल्लास और सांस्कृतिक वैभव के साथ हुआ। गुरुवार 19 मार्च 2026 को पूरा नगर आध्यात्मिक ऊर्जा,भक्ति भाव और सामाजिक एकता के रंगों में सराबोर नजर आया। नव संवत्सर के शुभ अवसर पर निकली भव्य शोभायात्राओं और आकर्षक झांकियों ने श्रीनगर को मानो एक जीवंत सांस्कृतिक रंगमंच में परिवर्तित कर दिया। मां भगवती के जयकारों,भजन-कीर्तन और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच विभिन्न सामाजिक,धार्मिक एवं सांस्कृतिक संगठनों द्वारा भव्य झांकियां सजाई गई,जो भारतीय संस्कृति,परंपरा और आध्यात्मिकता का जीवंत चित्र प्रस्तुत कर रही थीं। ऐतिहासिक गोला बाजार से प्रारंभ हुई यह विशाल शोभायात्रा गणेश बाजार,अप्पर बाजार,अढ़ात बाजार,वीर चंद्र सिंह गढ़वाली मार्केट,काला रोड,ब्राह्मण मोहल्ला होते हुए बदरीनाथ हाईवे तक निकाली गई। पूरे मार्ग में श्रद्धालुओं,व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों ने पुष्प वर्षा कर झांकियों का भव्य स्वागत किया। जय मां भगवती और हिन्दू नववर्ष मंगलमय हो के उद्घोष से वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठा। जब नगर के मुख्य बाजारों में झांकियां निकलीं,तो पूरा श्रीनगर उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में डूब गया। सड़कें लोकगीतों,पारंपरिक वाद्य यंत्रों और रंग-बिरंगे परिधानों से सजी नजर आई। हर उम्र के लोग इस सांस्कृतिक यात्रा के साक्षी बने और उत्साहपूर्वक इसमें सहभागी रहे। सुंदर पारंपरिक पहाड़ी परिधान में सजे छात्र-छात्राओं ने अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों का मन मोह लिया। उनकी झलकियों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि नई पीढ़ी अपनी संस्कृति को न केवल समझ रही है,बल्कि उसे गर्व के साथ आगे बढ़ाने का संकल्प भी ले रही है। इस आयोजन की खास बात यह रही कि युवा वर्ग ने पूरे उत्साह के साथ भागीदारी की। झांकियों के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति आज भी जीवंत है और नई पीढ़ी इसे आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है। इन प्रस्तुतियों ने दर्शकों को प्रदेश की धार्मिक और सांस्कृतिक गहराई से परिचित कराया। झांकियों के साथ-साथ पारंपरिक लोकनृत्य और गीतों ने आयोजन में चार चांद लगा दिए। चौफुला नृत्य,मांगल गीत और झुमेलो की प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया। ढोल-नगाड़ों की थाप पर थिरकते कलाकारों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। झांकियों में दिखी उत्तराखंड की विविध सांस्कृतिक झलक प्रस्तुत झांकियों में उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों की समृद्ध संस्कृति को बेहद सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया। इनमें जौनसार क्षेत्र के महासू देवता,चमोली की प्रसिद्ध नंदा देवी राजजात यात्रा,पिथौरागढ़ की हिलयात्रा महोत्सव और लखिया भूत,गोरखा समुदाय की सांस्कृतिक झलक,लाटू देवता और अन्य स्थानीय देव परंपराएं,पंच पांडवों की पौराणिक झलक तथा धारी देवी की आस्था प्रमुख रूप से शामिल रही। इन झांकियों ने दर्शकों को उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ते हुए गर्व की अनुभूति कराई। नववर्ष: नवचेतना और नवसंकल्प का प्रतीक हिन्दू नववर्ष के साथ ही चैत्र मास का शुभारंभ होता है,जो प्रकृति के नवजीवन और नवप्रभात का प्रतीक है। इस समय पेड़-पौधों में नई कोंपलें फूटती हैं,वातावरण में नई ऊर्जा का संचार होता है और मानव जीवन में नई आशाएं जन्म लेती हैं। यही कारण है कि यह पर्व केवल तिथि परिवर्तन नहीं,बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने का पावन अवसर माना जाता है। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं और धर्मप्रेमियों ने कहा कि हिन्दू नववर्ष हमें अपनी समृद्ध सनातन संस्कृति,प्रकृति के साथ सामंजस्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यह दिन समाज में प्रेम,सद्भाव,एकता और भाईचारे को सुदृढ़ करने का संदेश भी देता है। समापन अवसर पर मां भगवती से प्रार्थना की गई कि उनकी कृपा सभी पर बनी रहे और प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सुख,शांति,समृद्धि एवं उत्तम स्वास्थ्य का वास हो। साथ ही सभी ने यह संकल्प लिया कि वे अपने जीवन में सकारात्मकता,सेवा,संस्कार और राष्ट्र निर्माण के मूल्यों को आत्मसात करते हुए समाज के उत्थान में सक्रिय भूमिका निभाएंगे। यह भव्य आयोजन न केवल आस्था का प्रतीक बना,बल्कि श्रीनगर की सांस्कृतिक समृद्धि,सामाजिक एकता और जीवंत परंपराओं का एक प्रेरणादायक उदाहरण भी प्रस्तुत कर गया।

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