हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। भक्ति जब तपस्या बन जाए और तपस्या जब श्रद्धा का रूप ले ले,तब ईश्वर स्वयं साधक को अपने समीप बुला लेते हैं। श्रीनगर के प्राचीन गणेश मंदिर में विगत 27 अगस्त 2025 से चल रही श्री मत्स्य महापुराण कथा का दिव्य वातावरण भी इसी सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण बना। आज कथा का पंचम दिवस और नंदा अष्टमी के पावन अवसर पर मंदिर प्रांगण आस्था के अद्वितीय संगम से गूंज उठा,जहां श्रद्धालु भावविभोर होकर कथा का रसपान करते नजर आए। मंत्रों की गूंज घंटे-घड़ियालों की झंकार और भक्ति-संगीत की मधुर लहरियों से पूरा वातावरण आध्यात्मिक को उठा। व्यास पीठ पर विराजमान कथा वाचक मधुसूदन घिल्डियाल ने अपनी ओजस्वी वाणी से शिव-पार्वती की तपस्या और कामदेव दहन की कथा का दिव्य वर्णन कर भक्तों को जीवन में धैर्य आत्मसंयम,श्रद्धा और समर्पण का संदेश दिया। भक्तों को पार्वती की दिव्य तपस्या का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि नंदा अष्टमी का पर्व हमें त्याग,निष्ठा और अटूट श्रद्धा की सीख देता है। पुराणों में वर्णित है कि हिमालय कन्या पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए राजमहलों के सुख-सुविधाओं को त्यागकर वन-वन भटकते हुए कठोर तपस्या की। कथावाचक ने इस अवसर पर श्लोक उद्धृत किया-तपो बलं हि सर्वत्र न दैवं न च भाग्यकम्,श्रद्धया लभते सर्वं तपसा हि महेश्वरम्। अर्थात-संसार में तप ही सबसे श्रेष्ठ बल है। न केवल भाग्य और न केवल देवताओं की कृपा,बल्कि श्रद्धा और तपस्या के बल से ही भगवान महेश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। कामदेव दहन-देवताओं ने भगवान शिव की समाधि तोड़ने के लिए कामदेव को भेजा। वसंत की ऋतु में पुष्पबाण चलाकर कामदेव ने शिव के मन को विचलित करने का प्रयास किया। परंतु महादेव का वैराग्य अडिग रहा। क्रोधित होकर उन्होंने अपनी तीसरी नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया। वाचक ने श्लोक सुनाया-त्रिनेत्रं च त्रिशूलं च त्रिगुणं च त्रिकालजम्,संयमेन वशे तिष्ठेत् तस्य नास्ति दुरात्मता। शिव-पार्वती की तपस्या का दिव्य संदेश-कथा का मूल संदेश यह है कि ईश्वर की प्राप्ति केवल भक्ति से नहीं,बल्कि त्याग,तपस्या और आत्मसंयम से होती है। पार्वती ने सांसारिक सुखों को त्यागकर यह सिद्ध किया कि जब श्रद्धा और निष्ठा पूर्ण हों,तब समर्पण स्वयं दिव्यता बन जाता है। यह घटना हमें बताती है कि विकारों पर विजय ही आध्यात्मिक उन्नति की कुंजी है,संयमित मन ही जीवन की हर परीक्षा में विजयी होता है। भक्ति के साथ आत्मसंयम हो तो स्वयं ईश्वर भी साधक के निकट आते हैं। गणेश मंदिर समिति ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अधिक से अधिक संख्या में आकर कथा श्रवण का लाभ उठाएं। इस अवसर पर आचार्य मनीष डोभाल,नंदकिशोर बलूनी,संदीप उनियाल,मनोज बंगवाल,संदीप पुरोहित,भुवनेश भट्ट,नवीन सैफ सहित अन्य विद्वान पंडितों ने विधि-पूर्वक पूजन आरती में सहयोग दे रहे हैं। श्री मत्स्य महापुराण कथा से मिलने वाली तीन मुख्य जीवन शिक्षाएं-तपस्या से ही लक्ष्य की प्राप्ति संभव है,आत्मसंयम है सबसे बड़ा बल,श्रद्धा और भक्ति से ही जीवन में प्रकाश। गणेश मंदिर समिति ने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह करती है कि इस पावन कथा से प्रेरणा लेकर धैर्य,आत्मसंयम और भक्ति को अपने जीवन का आधार बनाएं। जहां तपस्या बनती है भक्ति,वहीं प्रकट होते हैं महादेव की भक्ति,तपस्या और आत्मसंयम से ही जीवन में उजाला और मोक्ष संभव है। इस अवसर पर गणेश मंदिर के मुख्य पुजारी रामकृष्ण पाण्डेय ने कहा कि नंदा अष्टमी का पर्व लोक आस्था और अध्यात्म का अद्वितीय संगम है,जब श्रद्धा और तपस्या एक साथ मिलती है तभी साधक के जीवन में दिव्यता का प्रकाश फैलता है। श्री मत्स्य महापुराण कथा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवन को अनुशासित और संयमित बनाने की प्रेरणा भी है। हम सभी को इस कथा से सीख लेकर अपने जीवन में भक्ति तपस्या और आत्मसंयम को आधार बनाना चाहिए। इस अवसर पर प्रभात पाण्डेय,राकेश जोशी,पारस बंसल,दीपक उनियाल,शुभम पडिहार,हरीश मिश्रा,रणजीत सिंह नेगी,रूपेश पन्त,गोपाल डुडेजा,नमन चांदना,राघव जोशी,सुरेंद्र चौहान,रेखा भट्ट,अलका पाण्डेय,वीना मिश्रा,मधु पडियार,पूजा मिश्रा,नीता जोशी,शकुन्तला रावत,रेखा रावत सहित श्रद्धालु भक्तगण उपस्थित रहे।