
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। भारत का मस्तक कहे जाने वाले पर्वतराज हिमालय के महत्व को उजागर करने और इसके संरक्षण का संदेश देने के लिए प्रत्येक वर्ष 9 सितम्बर को हिमालय दिवस मनाया जाता है। यह दिन हिमालय की पारिस्थितिकी,प्राकृतिक संसाधनों और यहां के निवासियों के जीवन से जुड़े सवालों को केंद्र में लाता है। मानव की सुख-सुविधाओं के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन,निरंतर कटते जंगल,सिमटते ग्लेशियर,सूखती नदियां और बढ़ता प्रदूषण हिमालय के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हिमालय का संतुलन बिगड़ा तो इसका असर पूरे देश की जल,जलवायु और जीवन प्रणाली पर पड़ेगा। हिमालय केवल बर्फ की चोटियों का समूह नहीं,बल्कि यह एक सभ्यता का पालक और करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। यहां से निकलने वाली नदियां उत्तर भारत की उपजाऊ धरती को सींचती हैं। यह न केवल जैव विविधता का भंडार है,बल्कि सामरिक दृष्टि से भी भारत की सुरक्षा का मजबूत प्रहरी है। उत्तराखंड,हिमाचल,जम्मू-कश्मीर,लद्दाख,सिक्किम और उत्तर-पूर्व के कई राज्य हिमालयी क्षेत्र में आते हैं। इन राज्यों की चुनौतियां देश के अन्य हिस्सों से भिन्न हैं,आपदा और भूस्खलन का लगातार खतरा,विकास कार्यों की अधिक लागत,सीमित आजीविका और रोजगार के अवसर, पलायन और अवसंरचना की कमी,इन समस्याओं को लेकर हिमालयी राज्य लगातार केंद्र सरकार के समक्ष विशेष नीति की मांग उठाते रहे हैं। उत्तराखंड के सामने जल संकट,आपदा प्रबंधन,पर्यावरणीय दबाव और पलायन जैसी गंभीर चुनौतियां हैं। यहां विकास कार्यों की लागत भी अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केंद्र से पर्याप्त सहयोग मिले तो उत्तराखंड न केवल अपनी समस्याओं का समाधान कर सकता है,बल्कि पूरे देश को पर्यावरणीय सेवाएं उपलब्ध कराने में अग्रणी भूमिका निभा सकता है। नीति आयोग और केंद्र सरकार से हिमालयी राज्यों की अपेक्षा है कि वे सामान्य विकास मॉडल की बजाय विशेष हिमालयी विकास मॉडल बनाएं। ऐसा मॉडल जो पारिस्थितिकी की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए टिकाऊ विकास का रास्ता दिखा सके। हिमालय केवल भारत की धरोहर नहीं,बल्कि पूरे विश्व की जलवायु संतुलन प्रणाली का आधार है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि हिमालय सुरक्षित नहीं रहेगा तो एशिया का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाएगा। हिमालय दिवस हमें यह याद दिलाता है कि हिमालय की रक्षा करना केवल हिमालय वासियों का दायित्व नहीं,बल्कि पूरे देश और विश्व की जिम्मेदारी है। जब तक हिमालय सुरक्षित है,तब तक जीवन सुरक्षित है। इसलिए आवश्यक है कि हम सभी मिलकर टिकाऊ विकास और पर्यावरणीय संवेदनशीलता पर आधारित नीतियों को अपनाएं। लेखक कमल किशोर डुकलान सरल ने बताया कि हिमालय हमारी अस्मिता और आस्था का प्रतीक है। इसकी चोटियां केवल बर्फ की नहीं,बल्कि हमारी पहचान की चादर हैं। यदि हिमालय सुरक्षित नहीं रहेगा तो हमारी संस्कृति भी संकट में पड़ जाएगी। यहां के वासियों की सुरक्षा,उनका जीवन और उनका भविष्य,सब हिमालय से ही जुड़ा है। हमें विकास के नाम पर हिमालय की बलि नहीं चढ़ानी चाहिए। हिमालय वासियों की समस्याएं देश की समस्याएं हैं,इन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। समय आ गया है कि केंद्र सरकार हिमालयी राज्यों की विशेष नीतियों पर गंभीरता से कदम उठाए। हर नागरिक को यह समझना होगा कि हिमालय का संरक्षण ही हमारी सांसों का संरक्षण है। आने वाली पीढ़ियों के लिए हिमालय को सुरक्षित रखना हमारा पवित्र दायित्व है। जब तक हिमालय जिंदा है,तब तक जीवन की हर धड़कन सुरक्षित है।