भारतीय भाषाओं के संस्कार-राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक गौरव का आधार–कमल किशोर डुकलान

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। हिंदी भारत के मन का संगीत है,करोड़ों भारतीयों की मातृभाषा है। प्रतिवर्ष 14 सितंबर को मनाया जाने वाला हिंदी दिवस हमें याद दिलाता है कि संविधान में

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। हिंदी भारत के मन का संगीत है,करोड़ों भारतीयों की मातृभाषा है। प्रतिवर्ष 14 सितंबर को मनाया जाने वाला हिंदी दिवस हमें याद दिलाता है कि संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिलने के बावजूद उसे उसका वास्तविक सम्मान अब तक नहीं मिल पाया है। भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं,बल्कि संस्कृति,परंपरा और ज्ञान-विज्ञान की संवाहक भी है। हर देश अपनी मातृभाषा के उत्थान के लिए संकल्पित है,लेकिन भारत में अक्सर अपनी ही भाषाओं के प्रति उपेक्षा का भाव देखने को मिलता है। यही कारण है कि अंग्रेजी के वर्चस्व में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की शक्ति लगातार कमजोर होती रही है। हिंदी दिवस-एक दिन हिंदी का,शेष अंग्रेजी का संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा घोषित किया। लेकिन उसके साथ ही 15 वर्षों तक अंग्रेजी को कामकाज की भाषा बनाए रखने का परंतुक भी जोड़ा गया। यह अस्थायी प्रावधान धीरे-धीरे स्थायी होता गया। आज भी वास्तविकता यह है कि वर्ष का केवल एक दिन हिंदी दिवस के नाम है और शेष 364 दिन अंग्रेजी का प्रभुत्व बना रहता है। यह धारणा गहरी बैठ गई है कि अंग्रेजी के बिना प्रगति असंभव है। जबकि तथ्य यह है कि एशिया के 48 देशों में अंग्रेजी राजभाषा नहीं है। जापान,जर्मनी,इटली,फ्रांस,इजरायल जैसे देश अपनी मातृभाषा में शिक्षा और अनुसंधान कर वैश्विक ताकत बने। महात्मा गांधी जी ने इस मानसिकता को देश के लिए अपराध बताया था कि भारत ही एक ऐसा देश है जहां माता-पिता अपने बच्चों को मातृभाषा के बजाय अंग्रेजी सिखाने में गर्व महसूस करते हैं। संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा बनाने पर लंबी बहस हुई। डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने कहा था,हमने अंग्रेजी के स्थान पर भारतीय भाषा को अपनाया है। सेठ गोविंद दास ने जोर दिया कि हमारे पास हजारों वर्षों की संस्कृति है,अब एक भाषा और एक लिपि जरूरी है। अलगू राय शास्त्री ने कहा अंग्रेजी हुकूमत गई,तो अब भाषा भी भारतीय होनी चाहिए। वी.आर.घुलेकर ने अंग्रेजी को वीरों की नहीं,गुलामी की भाषा बताया। फिर भी व्यावहारिक कारणों से अंग्रेजी का सहारा लिया गया,जो आज तक खत्म नहीं हो पाया। हिंदी-विविधता में एकता का सेतु-हिंदी मात्र भाषा नहीं,बल्कि भारत की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना की धारा है। इसमें अवधी,ब्रज,बुंदेली,भोजपुरी,कुमाऊनी,गढ़वाली,मारवाड़ी जैसी बोलियों का समन्वय है। ज्ञान-विज्ञान और साहित्य का विशाल भंडार हिंदी में उपलब्ध है। बाजार और उद्यम की सबसे प्रभावी भाषा भी हिंदी ही है। हिंदी किसी भी भारतीय भाषा की प्रतिद्वंद्वी नहीं है। वास्तव में अंग्रेजी ही वह शक्ति है जिसने तमिल,कन्नड़,बांग्ला,मराठी और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रभाव को कमजोर किया। अंग्रेजी केवल भाषा नहीं लाएं बल्कि उसके साथ अंग्रेजी संस्कार भी आए। परिणामस्वरूप भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कमजोर हुआ। इसके विपरीत हिंदी,तमिल,कन्नड़,बंगाली या मराठी जैसी भारतीय भाषाओं में निहित संस्कार हमारी राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समृद्धि को पुष्ट करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मन की बात का हिंदी में प्रसारण और नई शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा आधारित शिक्षा पर बल-ये सब संकेत हैं कि सरकार भारतीय भाषाओं के उत्थान की दिशा में प्रतिबद्ध है। प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा,अनुसंधान और रोजगार के अवसर बढ़ाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हिंदी दिवस का संकल्प-आज आवश्यकता है कि केवल सरकार की ही नहीं बल्कि हम भारत के लोग स्वयं अंग्रेजी की हीनग्रंथि से मुक्त हों। अंग्रेजी से बैर नहीं,लेकिन अपनी मातृभाषा की अवहेलना भी स्वीकार्य नहीं। हिंदी दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं को सम्मान मिले,शिक्षा,अनुसंधान और रोजगार में मातृभाषा का वर्चस्व बढ़े,और राजभाषा हिंदी को उसका वास्तविक गौरव दिलाया जाए। याद रखिए स्वभाषा के बिना स्वसंस्कृति निष्प्राण है,और संस्कृति के बिना राष्ट्र निर्जीव। हिंदी और भारतीय भाषाओं का विकास ही भारतीय एकता,अस्मिता और आत्मगौरव की सच्ची राह है।

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