हिन्दी दिवस एवं स्व.चंद्र कुंवर की पुण्यतिथि पर हिमालयन साहित्य एवं कला परिषद का भावपूर्ण आयोजन

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। हिमालयन साहित्य एवं कला परिषद श्रीनगर के तत्वावधान में हिंदी दिवस एवं छायावाद युग के अप्रतिम कवि स्व.चंद्र कुंवर बर्त्वाल की पुण्यतिथि के अवसर पर एक भव्य

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। हिमालयन साहित्य एवं कला परिषद श्रीनगर के तत्वावधान में हिंदी दिवस एवं छायावाद युग के अप्रतिम कवि स्व.चंद्र कुंवर बर्त्वाल की पुण्यतिथि के अवसर पर एक भव्य साहित्यिक संध्या का आयोजन किया गया। यह आयोजन प्रोफेसर उमा मैठाणी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ,जिसमें साहित्य,पत्रकारिता और कला जगत से जुड़े विद्वानों,लेखकों,कवियों,रचनाकारों और बुद्धिजीवियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से इसे विशेष बना दिया। आयोजन का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर डॉ.प्रकाश चमोली,राजेंद्र प्रसाद कपरवाण और नगर निगम पार्षद प्रवेश चमोली सहित विद्वतजनों ने स्वास्तिवाचन,वेद मंत्रों एवं श्लोकों के उच्चारण से पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण कर दिया। डॉ.दीपक द्विवेदी ने अपनी काव्य पंक्तियों भाषा का गौरव रचें योजित शब्द शटीक के पाठ से कार्यक्रम का सात्विक शुभारंभ किया। नीरज नैथानी ने वैश्विक परिदृश्य में हिंदी की उपादेयता पर विचार रखते हुए स्व.चंद्र कुंवर बर्त्वाल के जीवन और साहित्यिक यात्रा पर प्रकाश डाला। डॉ.आर.पी.थपलियाल ने अपनी रचना मुझको पहाड़ ही प्यारे हैं प्रस्तुत कर काव्य सरिता को प्रवाहित किया। वहीं अशोक थपलियाल ने हिंदी पत्रकारिता में अपने अनुभव साझा कर वर्तमान स्थिति का गहन विश्लेषण किया। डॉ.विमला चमोला ने अपनी काव्य प्रस्तुति देवों की वाणी संस्कृत सबको प्यारी है,से हिंदी की सार्थकता को पुष्ट किया। मीनाक्षी चमोली ने हिंदी की महत्ता पर आधारित रचना सुनाकर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। संस्था के वरिष्ठ संरक्षक कृष्णा नंद मैठाणी ने स्व.चंद्र कुंवर बर्त्वाल के जन्मस्थल,शैक्षिक जीवन और रचनात्मक पड़ावों पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा स्व.चंद्र कुंवर बर्त्वाल का साहित्य केवल कविताओं का संग्रह नहीं,बल्कि हिमालय की आत्मा और गढ़वाल की संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। उनकी कृतियां आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्गदर्शन देती रहेंगी। प्रोफेसर उमा मैठाणी ने संस्था की दस वर्षीय अध्यक्षता के अनुभव साझा करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के साहित्यिक परिवेश की स्मृतियां ताजा कीं।
उन्होंने कहा हिंदी हमारी पहचान और साहित्य हमारी सांस है। स्व.बर्त्वाल की स्मृति में किया गया यह आयोजन,भाषा और संस्कृति की निरंतरता का सशक्त प्रतीक है। सतीश चंद्र बहुगुणा ने अबोध बंधु बहुगुणा के गढ़वाली साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डाला,जबकि प्रो.आर.एन.गैरोला ने हिंदी की राष्ट्रभाषा के रूप में सर्वव्यापकता को रेखांकित करते हुए अपनी पंक्तियां कवि बना तू कविता सुनाई। नगर पार्षद प्रवेश चमोली ने हिंदी साहित्य के आदिकाल से आधुनिक युग तक के विभिन्न पड़ावों की विस्तृत विवेचना की। प्रो.सम्पूर्ण सिंह रावत ने लैंसडाउन प्रवास से जुड़े साहित्यकारों की स्मृतियां साझा कीं। डॉ.प्रकाश चमोली ने लोकभाषा गढ़वाली में पितृपक्ष पर आधारित गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं का मन मोह लिया। उन्होंने कहा लोकभाषाएं हमारी संस्कृति की जड़ें हैं। गढ़वाली गीत न केवल हमारी परंपराओं का जीवंत प्रमाण हैं,बल्कि वे जनमानस की आस्था और जीवन दृष्टि को भी अभिव्यक्त करते हैं। उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को अपनी मिट्टी और लोक संवेदनाओं से जुड़ने का अवसर दिया। पी.सी.चक्रवर्ती ने हिंदी दिवस और चंद्र कुंवर बर्त्वाल के कृतित्व पर विचार रखे। डॉ.श्रीकृष्ण उनियाल ने शाइनी कृष्ण उनियाल की रचना प्रस्तुत कर संध्या को अविस्मरणीय बना दिया। इस अवसर पर कृष्ण बल्लभ थपलियाल,केशव प्रसाद काला,उम्मेद सिंह मेहरा सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम ने जहां हिंदी दिवस की सार्थकता को नए आयाम दिए,वहीं स्व.चंद्र कुंवर बर्त्वाल की स्मृतियों को पुनर्जीवित कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की। यह आयोजन न केवल साहित्यिक चेतना का संवाहक बना,बल्कि हिंदी और गढ़वाली भाषा की सांस्कृतिक धरोहर को भी नई ऊर्जा प्रदान कर गया।

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