अद्भुत हमारी संस्कृति-“इगास फेस्टिवल: अद्भुत संस्कृति और लोक जीवन का अनोखा उत्सव

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड की लोक संस्कृति में इगास बग्वाल केवल दीपों का पर्व नहीं,बल्कि यह हमारे जीवन,श्रम,पशुधन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का अद्वितीय उत्सव है। यह पर्व उस

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड की लोक संस्कृति में इगास बग्वाल केवल दीपों का पर्व नहीं,बल्कि यह हमारे जीवन,श्रम,पशुधन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का अद्वितीय उत्सव है। यह पर्व उस आत्मीय रिश्‍ते की झलक दिखाता है,जो सदियों से मनुष्य,पशु और धरती के बीच गहराई से बुना हुआ है। गाय मातृत्व,समृद्धि और कृषि संस्कृति की आत्मा इगास पर्व की सुबह गांवों में विशेष उल्लास का वातावरण रहता है। घर-घर में गायों और बैलों को स्नान कराया जाता है। उन्हें हल्दी,रोली और चावल से तिलक लगाया जाता है। गले में फूलों की मालाएं सजाई जाती हैं और स्नेहपूर्वक गुड़,आटे की छापड़ी या पुरन खिलाई जाती है। यह पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि कृतज्ञता का प्रतीक है क्योंकि गाय हमारे अन्न,ऊर्जा और आजीविका की जननी है। वह खेतों की उर्वरता,दूध की मधुरता और जीवन की समृद्धि का स्रोत है। गढ़वाल की लोक कहावत इस भावना को बड़े सहज रूप में व्यक्त करती है गाय बिनु घर उजाड़,बैल बिनु खेत सूने। अर्थात गाय और बैल के बिना न तो घर का अस्तित्व है,न खेती का जीवन। भेलो जलाना-अंधकार से उजाले की ओर यात्रा का प्रतीक संध्या ढलते ही गांवों में बच्चों और युवाओं के चेहरे खुशी से दमक उठते हैं। हर हाथ में भेलो यानी लकड़ी या घास-फूस से बनी छोटी-छोटी मशालें जल उठती हैं। आसमान की ओर घूमती हुई इन जलती भेलो की कतारें जब पूरे आकाश में घूमती हैं,तो मानो अंधकार को पराजित करने और उजाले का स्वागत करने का संदेश देती हैं। यह दृश्य न केवल सौंदर्य का,बल्कि लोक-आस्था और एकता का प्रतीक बन जाता है। लोक आनंद में रमा पूरा गांव
इगास पर्व के इस अवसर पर हर घर में दीपों की ज्योति,ढोल-दमाऊ की थाप और लोकगीतों की मधुर गूंज वातावरण को पावन बना देती है। बच्चे भेलो जलाते हैं,बुजुर्ग लोककथाएं सुनाते हैं और महिलाएं पारंपरिक पकवानों की सुगंध से घर आंगन महकाती हैं। इस पावन अवसर पर पूर्व विधायक गणेश गोदियाल एवं उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रवक्ता राजेश चमोली ने भी थलीसैंण क्षेत्र में आयोजित गाय पूजन कार्यक्रम में सहभागिता की। दोनों जनप्रतिनिधियों ने ग्रामीणों के साथ मिलकर गौमाता की पूजा की और इस परंपरा को हमारी संस्कृति की आत्मा बताया। पूर्व विधायक गणेश गोदियाल ने कहा कि इगास हमारी मिट्टी की खुशबू और लोक जीवन की आत्मा से जुड़ा पर्व है। यह हमें हमारी जड़ों,परंपराओं और पशुधन के महत्व की याद दिलाता है। गायों की पूजा केवल आस्था नहीं,बल्कि हमारी जीवनशैली का आधार है। जब तक हम अपनी संस्कृति को संजोए रखेंगे,तब तक हमारी पहचान अमर रहेगी। उन्होंने आगे कहा कि इगास पर्व सामाजिक एकता,श्रम और कृतज्ञता का प्रतीक है जो हमें प्रकृति और परिश्रम के प्रति सम्मान का भाव सिखाता है। गांववासियों ने भी दीपों,गीतों और उल्लास के बीच इस पर्व को एक सामाजिक उत्सव के रूप में मनाया। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक हर कोई आनंद और श्रद्धा में सराबोर नजर आया। इगास-लोक संस्कृति का जीवंत उत्सव इगास बग्वाल केवल तिथि का नहीं,बल्कि हमारी लोक आत्मा का उत्सव है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची समृद्धि केवल संपत्ति में नहीं,बल्कि प्रकृति, पशुधन और संस्कृति के प्रति सम्मान में निहित है। जहां दीप जलते हैं,वहां अंधकार टिक नहीं पाता और जहां इगास मनाई जाती है,वहां लोक संस्कृति सजीव रहती है।

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