हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
देहरादून/देवप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। योग और अध्यात्म एक-दूसरे के पूरक हैं,इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। यह उद्गार केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.श्रीनिवास वरखेड़ी ने व्यक्त किए। वे देहरादून के लेखक गांव में आयोजित अंतरराष्ट्रीय स्पर्श हिमालय महोत्सव-2025 के अंतर्गत आयोजित सत्र योग एवं अध्यात्म में विशिष्ट अतिथि के रूप में बोल रहे थे। अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो.वरखेड़ी ने कहा कि योग केवल साधना नहीं,जीवन की वैज्ञानिक शैली है। उन्होंने कहा हमारा शरीर हमारे न चाहने पर भी योग करता रहता है-आंखों का झपकना,सांसों का चलना,बोलना,चलना,सोना यह सब सहज योग क्रियाएं हैं। योग हमारे अस्तित्व की मूल संरचना है,जो हमें मनुष्य होने की उच्चतम स्थिति तक ले जाती है। उन्होंने कहा कि विश्व को योग जैसा दर्शन और ज्ञान भारत ने ही दिया है। हमारे सभी अंग एक-दूसरे के साथ समन्वय और सहयोग के माध्यम से कार्य करते हैं,यही योग का वास्तविक दर्शन है। प्रो.वरखेड़ी ने कहा कि अध्यात्म का मूल भी योग में ही निहित है। योग को अध्यात्म से पृथक नहीं किया जा सकता क्योंकि योग आत्मा और परमात्मा के मिलन का मार्ग है। कुलपति ने कहा कि भारत की भूमि योग की साधना से ओत-प्रोत है। हमारे स्वर-पट (vocal cords) वेदवाणी और मंत्रोच्चारण के ऐसे उच्चारण कर सकते हैं जो अन्य देशों के लोगों के लिए कठिन हैं-यह हमारी आध्यात्मिक साधना और तपस्या की देन है। उन्होंने कहा यदि हम योग के बिना भोग करते हैं तो जीवन में असंतुलन और दुःख बढ़ते हैं। योग को त्यागना अपने अस्तित्व को त्यागना है। महाभारत का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अर्जुन का विषाद भी योग बन गया था,क्योंकि वह आत्म-ज्ञान की ओर प्रेरित करता है। आज की नई पीढ़ी में जो मानसिक तनाव और अवसाद की स्थिति है,उसका समाधान केवल योग और अध्यात्म के समन्वय में ही संभव है। प्रो.वरखेड़ी ने कहा कि भारत में जन्म लेना प्रत्येक व्यक्ति का सौभाग्य है। उन्होंने कहा व्यक्ति के विचार,दर्शन और विश्वास उसके जन्मस्थान और वातावरण से प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है यहां के कण-कण में दैविक ऊर्जा विद्यमान है। उन्होंने कहा कि भारत का दर्शन हमेशा परहित और लोककल्याण का रहा है। हमें सिखाया गया है कि भोग से अधिक सुख त्याग में है। आज की पीढ़ी में इस शेयरिंग की भावना को विकसित करने की आवश्यकता है। सत्र के बाद प्रो.वरखेड़ी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.रमेश पोखरियाल निशंक से मुलाकात की। इस अवसर पर उन्होंने अपनी पुस्तक शास्त्रपद्धति उन्हें भेंट की और उच्च शिक्षा,संस्कृत शिक्षा,पांडुलिपियों के संरक्षण और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा की। डॉ.निशंक ने कहा कि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय को भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा,शास्त्रीय ग्रंथों और पांडुलिपियों के संरक्षण की दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। कुलपति ने आश्वासन दिया कि विश्वविद्यालय शीघ्र ही लेखक गांव में उपलब्ध पुस्तकों और पांडुलिपियों से ज्ञान-संवर्धन हेतु विशेष कार्ययोजना बनाएगा। प्रो.वरखेड़ी ने लेखक गांव का भ्रमण भी किया जहां उन्होंने ज्योतिष आधारित डिजिटल फ्रेम का प्रदर्शन देखा और इसे विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के लिए अत्यंत उपयोगी बताया। कार्यक्रम में देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों के कुलपति,निदेशक और विषय विशेषज्ञ उपस्थित रहे। लेखक गांव की यह गोष्ठी केवल योग और अध्यात्म पर विमर्श नहीं थी,बल्कि यह भारत की जीवंत ज्ञान परंपरा और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक थी। प्रो.वरखेड़ी और डॉ.निशंक के संवाद ने यह संदेश दिया कि भारतीय शिक्षा और संस्कृति का भविष्य तभी उज्जवल होगा जब योग,अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय बना रहेगा।