पहाड़ी स्वाद और संस्कृति का अनूठा संगम-बैकुण्ड मेले में रस्याण प्रतियोगिता ने खींचा सबका ध्यान

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भंडारी श्रीनगर गढ़वाल। बैकुण्ठ चतुर्दशी मेले की रंगीन परंपरा में इस बार पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू और लोक संस्कृति का स्वाद घुल गया। सोमवार को आयोजित पहाड़ी रस्याण प्रतियोगिता ने

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भंडारी

श्रीनगर गढ़वाल। बैकुण्ठ चतुर्दशी मेले की रंगीन परंपरा में इस बार पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू और लोक संस्कृति का स्वाद घुल गया। सोमवार को आयोजित पहाड़ी रस्याण प्रतियोगिता ने न केवल श्रीनगर के वातावरण को स्वादिष्ट बना दिया,बल्कि गढ़वाली,कुमाऊंनी और जौनसारी रसोई की पुरातन विरासत को भी जीवंत कर दिया। नगर निगम श्रीनगर और मेले की आयोजन समिति के संयुक्त तत्वावधान में हुई इस प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने पहाड़ी व्यंजनों की अनोखी श्रृंखला प्रस्तुत की। कार्यक्रम के दौरान मेला परिसर कंडाली की सब्जी,गहत की दाल,झंगोरे की खीर,भांग की चटनी और पहाड़ी पकोड़ों की सुगंध से सराबोर हो गया। दर्शकों ने परंपरागत बर्तनों,पत्तलों और सजावट से सुसज्जित व्यंजनों को देखकर पुरानी ग्रामीण संस्कृति की झलक महसूस की। प्रतियोगिता दो वर्गों में आयोजित हुई-महिला स्वयं सहायता समूह वर्ग,महिला समूह वर्ग। स्वयं सहायता समूह वर्ग में तीरथ धाम समूह ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रथम स्थान प्राप्त किया,शक्ति धाम समूह द्वितीय और भागीरथी समूह तृतीय स्थान पर रहे। वहीं महिला समूह वर्ग में रश्मि भट्ट ने उत्कृष्ट प्रस्तुति के साथ प्रथम स्थान,जसोदा देवी ने द्वितीय और लक्ष्मी देवी ने तृतीय स्थान हासिल किया। प्रतिभागियों ने स्थानीय अनाजों और सब्जियों से बने पारंपरिक व्यंजन जैसे कंडाली की भाजी,मंडुवे की रोटी,गहत का फाणू,झंगोरे की खीर,भांग की चटनी आदि तैयार किए। निर्णायक मुकेश भट्ट और सरिता कलूडा ने स्वाद,साज-सज्जा और पारंपरिक प्रस्तुति के आधार पर मूल्यांकन किया। उन्होंने कहा कि पहाड़ी व्यंजन हमारी संस्कृति की आत्मा हैं। इस तरह की प्रतियोगिताएं न केवल पारंपरिक पाक कला के संरक्षण में सहायक हैं,बल्कि स्थानीय उत्पादों को बाजार से जोड़ने का भी अवसर देती हैं। कार्यक्रम में नगर निगम प्रतिनिधियों,मेले की आयोजन समिति के सदस्यों और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिकों ने भाग लिया। प्रतियोगिता के अंत में सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र और प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। महिलाओं की भागीदारी ने यह संदेश दिया कि पहाड़ी रसोई केवल स्वाद नहीं,बल्कि हमारी पहचान और स्वावलंबन का प्रतीक है। बैकुण्ठ मेले की यह रस्याण प्रतियोगिता न केवल स्वाद का उत्सव बनी,बल्कि उसने एक बार फिर यह साबित किया कि उत्तराखंड की संस्कृति अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है-जहां हर व्यंजन में परंपरा,प्रेम और प्रकृति का आशीर्वाद घुला है।

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