
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल/नई दिल्ली। हिमालय की गोद में पलने वाला अब तक उपेक्षित च्यूरा का पेड़ (वैज्ञानिक नाम Diploknema butyracea) अब भारतीय दवा उद्योग की दिशा बदल सकता है। उत्तराखंड के मूल निवासी और दिल्ली फार्मास्यूटिकल साइंसेज एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी (DPSRU) में कार्यरत वैज्ञानिक डॉ.देवेश तिवारी ने अपनी शोध टीम के साथ मिलकर इस वृक्ष से पहली बार अत्याधुनिक नैनो ड्रग डिलीवरी सिस्टम ब्यूटायरोसोम्स (Butyrosomes) विकसित करने में सफलता पाई है। इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल इनोवेशन (स्प्रिंगर नेचर) में प्रकाशित हुए हैं,जिससे भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक समुदाय में उत्सुकता बढ़ गई है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़,चंपावत,अल्मोड़ा और गढ़वाल के पर्वतीय अंचलों में प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला यह वृक्ष स्थानीय भाषा में फुलवारा या कल्पवृक्ष के नाम से जाना जाता है। नेपाल,भूटान,सिक्किम और चीन के हिमालयी इलाकों में भी इसकी उपस्थिति पाई जाती है। स्थानीय लोग सदियों से इसके बीजों से घी निकालकर भोजन और औषधीय उपयोग में लाते हैं। इस कारण इसे इंडियन बटर ट्री भी कहा जाता है। इस घी को च्यूरा घी या फुलवारा घी के नाम से जाना जाता है,जिसमें 55 से 65 प्रतिशत तक प्राकृतिक वसा (लिपिड्स) मौजूद रहते हैं। डॉ.देवेश तिवारी की टीम ने च्यूरा घी से वसा को शुद्ध कर उससे ब्यूटायरोसोम्स नामक एक अत्याधुनिक नैनो-ड्रग डिलीवरी प्रणाली विकसित की। यह प्रणाली आधुनिक एलोपैथिक दवाइयों को शरीर में अधिक समय तक प्रभावी बनाए रखने में मदद करती है। टीम के अनुसार विकसित नैनोकणों का आकार मात्र 230 नैनोमीटर पाया गया,जो अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर दवा को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में सक्षम है। इसकी बाइंडिंग क्षमता 97% से अधिक पाई गई और यह 24 घंटे में लगभग 98% तक दवा रिलीज कर सकती है-यानी यह एक सस्टेन्ड रिलीज दवा प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण है। अध्ययन से यह भी साबित हुआ कि च्यूरा घी में किसी भी प्रकार की विषैली भारी धातु (Heavy Metals) मौजूद नहीं हैं, जिससे यह जैविक रूप से सुरक्षित है। डॉ.देवेश तिवारी के नेतृत्व में इस शोध में डॉ.गौरव जैन,डॉ.अनूप कुमार,डॉ.सूरजपाल वर्मा,शोध छात्र नीतीश जंगवान,अभिषेक आनंद और ज्योति सैनी शामिल रहे। टीम का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में उपलब्ध यह संसाधन दवा उद्योग के लिए सस्टेनेबल बायोलिपिड सोर्स बन सकता है,जो देश की दवा निर्माण क्षमता को आत्मनिर्भर बनाएगा। डॉ.तिवारी का कहना है भारत विश्व का अग्रणी दवा निर्माता देश है,लेकिन कच्चे माल का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। यदि हम हिमालयी च्यूरा से प्राप्त वसा को दवा निर्माण के कच्चे माल के रूप में उपयोग करें,तो हम आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ा सकते हैं। उत्तराखंड में पहले से ही कई फार्मास्यूटिकल कंपनियां कार्यरत हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर च्यूरा जैसे वृक्षों के वाणिज्यिक उपयोग से प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था,रोजगार सृजन,और वन आधारित उद्योगों को नया जीवन मिल सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार,इस शोध से भारत की नैनोफार्मास्यूटिकल तकनीक को नई दिशा मिलेगी। यदि उद्योग जगत और सरकार इस नवाचार को अपनाते हैं,तो हिमालयी क्षेत्र के वन उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान मिलेगी,और मेड इन इंडिया ब्रांड की दवाइयां अधिक टिकाऊ,प्रभावी और किफायती बन सकेंगी। जहां अब तक च्यूरा केवल ग्रामीण उपयोग का पेड़ माना जाता था,वहीं अब यह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि का आधार बन गया है। डॉ.तिवारी की यह खोज न केवल उत्तराखंड की जैव विविधता को वैज्ञानिक पहचान दिलाएगी,बल्कि यह भी सिद्ध करेगी कि प्रकृति ही आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी प्रयोगशाला है।