

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। थलीसैंण विकास खण्ड के बूंखाल में स्थित कालिंका देवी माता मंदिर लोगों की आस्था,विश्वास और श्रद्धा का एक बड़ा केंद्र है। कांलिका मेले में में सदियों से चली बलि प्रथा इस क्षेत्र की हमेशा से पहचान रही है। सन 2014 से मंदिर में बलि प्रथा बंद होने के बाद पूजा-अर्चना,आरती,डोली यात्रा,कलश यात्रा और मेले के स्वरूप की भव्यता इसकी परिचायक है। उत्तराखंड में प्रसिद्ध बूंखाल कालिंका माता मंदिर से जुड़ा कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं है। क्षेत्र के बुजुर्गों के अनुसार मंदिर का निर्माण करीब 1800 ईसवी में पत्थरों से तैयार किया गया था। 18 वीं सदी में पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण ब्लाक में स्थित चोपड़ा गांव में एक लोहार परिवार में एक कन्या का जन्म हुआ,जो ग्वालों (पशु चुगान जाने वाले मित्र) के साथ बूंखाल में गाय चुगाने गई। जहां सभी खेल खेलने लगे। इसी बीच कुछ बच्चों ने उस कन्या को एक गड्ढे में छिपा दिया। सामान्यत: गायों के खो जाने पर सभी बच्चे उन्हें खोजने चले जाते हैं। गड्ढे में छुपाई कन्या को वहीं भूल जाते हैं। काफी खोजबीन के बाद कोई पता नहीं चला। इसके बाद वह कन्या मां काली के रोद्र रुप में अपनी मां के सपने में आई। मां काली के रौद्र रूप दिखी कन्या ने हर वर्ष बलि दिए जाने पर मनोकामनाएं पूर्ण करने का आशीर्वाद दिया। इसके बाद क्षेत्र वासियों ने मां कालिंका देवी का मंदिर बनाया। गौरतलब है कि लंबे समय से पौड़ी गढ़वाल की समाज सेविका सरिता नेगी ने बूंखाल के कालिंका देवी मंदिर में बलि प्रथा को बंद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने गौरी मौलखी जैसे अन्य स्थानीय लोगों एवं स्थानीय विभिन्न सामाजिक व धार्मिक संगठनों के साथ ही पशुबलि प्रथा को रोकने लोगों को जागरूक किया,जिसके कारण इस प्रथा को बंद किया जा सका और मंदिर में पूजा-अर्चना,आरती और कलश यात्रा जैसे नए आयाम जुड़े,जिससे यह प्रथा समाप्त हो गई और नारियल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। समाज सेविका के दृढ़ संकल्प और प्रयासों से बूंखाल की कांलिका देवी मंदिर में पशु बलि प्रथा पूर्णतया बंद हुई। पौड़ी गढ़वाल की समाज सेविका सरिता नेगी ने सामाजिक जागरूकता और सामुदायिक प्रयासों के माध्यम से बूंखाल कालिंका देवी मंदिर में बलि प्रथा के उन्मूलन में एक निर्णायक भूमिका निभाई। सरिता नेगी बूंखाल कांलिका देवी मंदिर में पशु बलि प्रथा समाप्ति के प्रयासों के दौरान उन्हें प्रशासनिक व सामाजिक दोनों स्तरों पर भारी विरोध का सामना करना पड़ा। स्थानीय क्षेत्रवासी लम्बे समय तक बलि प्रथा के साथ जुड़े हुए थे। उनका मानना था कि जो कोई भी इस प्रथा के खिलाफ काम करेगा,उसकी जान से मारने की धमकी दी जाएगी। हालांकि समाज सेविका की दृढ़ता और सामाजिक समर्थन ने धीरे-धीरे इस कुप्रथा को समाप्त करने में मदद की। उन्होंने प्रशासन से भी सहयोग मांगा और बार-बार जिलाधिकारी को पत्र लिखकर इस प्रथा को रोकने की मांग की। सन 2008 में सरिता नेगी ने न केवल बलि कुंड को बंद किया,बल्कि उसे गंगा में विसर्जित कर दिया। उनके इस कदम ने पूरे क्षेत्र में एक नई सोच को जन्म दिया। धीरे-धीरे लोग समझने लगे कि पशु बलि किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा कभी नहीं हो सकती। समाज सेविका सरिता नेगी ने अपने प्रयासों से न केवल बलि प्रथा को रोका,बल्कि इस विषय पर व्यापक जागरूकता भी फैलायी। उन्होंने सम्पूर्ण क्षेत्र में सामाजिक बदलाव लाने का बीड़ा उठाया और अन्य लोगों को भी इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित किया। उनका प्रयास न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे भारत के लिए एक मिसाल बना है कि कैसे दृढ़ निश्चय और सामाजिक समर्थन से सामाजिक कुप्रथाओं को रोका जा सकता है। समाज सेविका सरिता नेगी की कहानी उन वीरांगनाओं की है जिन्होंने अपनी संस्कृति और समाज को बदलने के लिए समाज का विरोध सहा। उनका संघर्ष न केवल पशु बलि प्रथा के खिलाफ था,बल्कि उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि सही इरादे और कड़ी मेहनत से समाज में बदलाव लाया जा सकता है। उनके प्रयास आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं और भविष्य में भी प्रेरणादायक रहेंगे। भक्ति,आस्था और उल्लास से सराबोर बूंखाल कालिंका मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शनों को हजारों श्रद्धालु मेले में पहुंचे। प्रतिवर्ष दिसंबर माह में आयोजित होने वाले इस मेले को लेकर बूंखाल में दूर-दूर से श्रद्धालु आस्था के इस केंद्र मां कालिंका के दर्शनों के लिए उमड़े। 6 दिसम्बर 2025 शनिवार को बूंखाल मेले में जागर सम्राट पद्मश्री प्रीतम भरतवाण के जागरों ने मेरे को भक्तिमय बनाया। वहीं पतंजलि योग पीठ के बालकृष्ण एवं प्रदेश के स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री डॉ.धन सिंह रावत के नेतृत्व में प्रसाद रुप में भण्डारे का आयोजन किया गया।