वंदेमातरम भारतीय राष्ट्रीयता का आध्यात्मिक जयघोष–डॉ.कमल सिंह डुकलान सरल

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के अमर गीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने पर वन्देमातरम की चर्चा संसद में ही नहीं वरन पूरे देश में हो रही

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के अमर गीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने पर वन्देमातरम की चर्चा संसद में ही नहीं वरन पूरे देश में हो रही है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् मात्र एक देशभक्ति गीत नहीं,बल्कि भारतीय राष्ट्रीयता का आध्यात्मिक जयघोष भी है। वर्तमान समय में वंदे मातरम् से जुड़े ऐसे अनेक तथ्य चर्चा-परिचर्चा में सामने आए हैं,जो आज की युवा पीढ़ी में ही नहीं,वर्तमान पीढ़ी में भी कम ही लोग जानते होंगे। जैसे कि यह उजागर होना कि वंदे मातरम् का वर्तमान स्वरूप उसका खंडित संस्करण है। अभी गाए जाने वाले दो छंदों के अलावा चार छंद और भी हैं। पिछली सरकारों ने तुष्टीकरण की राजनीति के चलते वन्देमातरम के केवल दो छंद को ही गाये जाने की मान्यता दी है। असल में ब्रिटिश राष्ट्रीय गीत गाड सेव द क्वीन को भारत के घर-घर पहुंचाने के षड्यंत्र के जवाब में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में वंदे मातरम् लिखा,जिसे 1882 में उन्होंने अपने उपन्यास आनंद मठ में शामिल किया। वंदे मातरम् भारत के सभ्यतागत इतिहास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ही अभिव्यक्ति है,जो अनादिकाल से भारत की रग-रग में रचा-बसा रहा। बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम् को मातृभूमि की वंदना के रूप में गाया गया है। राष्ट्र के प्रति ऐसा भाव भारतीय संस्कृति में सदैव से रहा है। वेदों में माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः जैसा उद्घोष है। इसका अर्थ है-भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं। रामायण में भगवान श्रीराम ने वही भाव व्यक्त किया कि जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों में जगत का पालन करने वाली धरती हमारी मातृशक्ति है। इसी मातृशक्ति की आराधना वंदे मातरम् के रूप में होती है। बंकिमचन्द्र ने आनंदमठ में असंख्य भारतीय संतानों के कंठों से उच्चरित वंदे मातरम् के माध्यम से इसी शाश्वत मूल्य का उद्घोष किया है। छह छंदों वाले वन्देमातरम को 1896 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार गाया। 1901 में इसे दूसरी बार गाया गया। दिसंबर 1905 में कांग्रेस कार्यकारिणी में यह निर्णय हुआ कि इसे अखिल भारतीय आयोजनों में गाया जाएगा। बंग-भंग आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय वंदे मातरम् के साथ एकजुट खड़े हुए। मैडम भीकाजी कामा ने 1907 में जर्मनी में जब पहला तिरंगा फहराया,उस पर वंदे मातरम् अंकित था। चिदंबरम पिल्लई ने स्वदेशी जहाज पर वंदे मातरम् लिखवाया था। रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी क्रांति-गीतांजलि का पहला गीत वंदे मातरम् रखा। भगत सिंह अपने पत्रों की शुरुआत वंदे मातरम् से करते थे। महात्मा गांधी ने 1905 में लिखा। बल्कि यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया है कि यह हमारा नेशनल एंथम बन गया है। खिलाफत आंदोलन में भी इसकी शुरुआत सम्मानपूर्वक होती थी। कई वरिष्ठ मुस्लिम नेता इसके सम्मान में उठ खड़े होते थे। अशफाक उल्ला खान इसे गाते हुए फांसी पर झूल गए। आरिफ मोहम्मद खान ने इसका उर्दू अनुवाद किया। तथापि मुस्लिम लीग की मजहबी राजनीति के कारण इस गीत का विरोध बढ़ा। 1923 के कांग्रेस अधिवेशन में भी इसका विरोध हुआ। नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने 1937 में इसके केवल पहले दो छंदों को मान्यता दी। हालांकि नेहरू स्वयं 1937 तक स्पष्ट रूप से कहते रहे कि गीत में देवी-पूजा का आरोप हास्यास्पद है। जिन्ना द्वारा 1937 में विरोध का नारा बुलंद करने के बाद तुष्टीकरण के दबाव में यह गीत विभाजित कर दिया गया। राष्ट्रगान के चयन में भी इसे अनदेखा किया गया,जबकि इसकी लोकप्रियता निर्विवाद थी। अंततः संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया। कथित विवादित छंदों में भारत माता को बहुबलधारिणी,विद्या,धर्म,शक्ति,भक्ति,लक्ष्मी,सरस्वती और दुर्गा के रूपों में चित्रित किया गया है-ये मानव जीवन के आवश्यक आयाम हैं। धन,विद्या और शक्ति-तीनों ही राष्ट्र की उन्नति के आधार हैं। आज समय है कि संविधान के अनुच्छेद 51(A) में नया मौलिक कर्तव्य जोड़कर वंदे मातरम् को राष्ट्रगान जैसा सम्मान देने पर गंभीरता से विचार किया जाए। युगप्रणेता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के प्रति यह राष्ट्र का उचित सम्मान होगा।

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