
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। जनपद रुद्रप्रयाग की पट्टी बच्छणस्यूं और पौड़ी गढ़वाल की कण्डारस्यूं पट्टी की सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था का केन्द्र डौन्डियोंखाल एक बार फिर श्रद्धा,उल्लास और लोक परंपराओं के रंग में रंगने जा रहा है। क्षेत्र की आराध्य देवी मां कालिका के पावन धाम डौन्डियोंखाल में प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी 27 दिसंबर 2025 पौष माह के शनिवार को भव्य एवं दिव्य मेले का आयोजन किया जाएगा। ऊंची पर्वत चोटी पर बांज,बुरांश और काफल के सघन वनों से घिरे इस मनोरम स्थल पर स्थित मां कालिका का मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि पर्यटन एवं तीर्थाटन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। पौड़ी-मोलखाखाल मोटर मार्ग से लगभग एक किलोमीटर की पैदल चढ़ाई के बाद यह पवित्र स्थल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति और प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य का अनुपम संगम प्रदान करता है। मान्यता है कि प्राचीन काल में इस मेले में पशुबलि की परंपरा प्रचलित थी,लेकिन समय के साथ सामाजिक चेतना के चलते यह प्रथा अब पूर्णतः बंद हो चुकी है। आज यह मेला लोक आस्था और सांस्कृतिक उत्सव का प्रतीक बन गया है। मेले के दिन विभिन्न गांवों से श्रद्धालु देवी की डोली,निशाण एवं घण्डियाल देवता की थाल के साथ ढोल-दमाऊं और भोंकरों की गूंज में नाचते-गाते हुए डौन्डियोंखाल पहुंचते हैं। यह दृश्य देखते ही बनता है और देवभूमि की जीवंत लोक-संस्कृति का साक्षात दर्शन कराता है। मंदिर परिसर से दूर-दूर तक हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां,गहरी घाटियां और पहाड़ों का विशाल विस्तार दिखाई देता है,जो श्रद्धालुओं और पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। चारों ओर फैला घना बांज-बुरांश का जंगल इस स्थान की दिव्यता को और भी बढ़ा देता है। कुछ समय पूर्व मंदिर समिति द्वारा जन सहयोग से मंदिर का भव्य नव निर्माण किया गया है। वर्तमान में मंदिर के रख-रखाव एवं व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी समिति द्वारा ही निभाई जा रही है,जिससे मंदिर की गरिमा और व्यवस्थाएं और अधिक सुदृढ़ हुई हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां भगवती के मैती बच्छणस्यूं पट्टी के ग्राम आंकसेरा के खाती गुसांई माने जाते हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित पत्थर का आप-लिंग खाती गुसांई के पूर्वजों द्वारा स्थापित किया गया है। मान्यता है कि इस लिंग को बाहर निकालने का अधिकार केवल मैती ग्राम आंकसेरा के गुसांई लोगों को ही प्राप्त है। मंदिर के पूजारी कण्डारस्यूं पट्टी के शरणा गांव से हैं,जो देवी एवं घण्डियाल देवता की पूजा संपन्न कराते हैं। वहीं बच्छणस्यूं के ग्राम काण्डई के चमोली इस मंदिर में हवन के अधिकारी हैं तथा मंदिर का शुद्धिकरण भी चमोली पंडितों द्वारा किया जाता है। यह परंपराएं सदियों से चली आ रही धार्मिक समन्वय की अनूठी मिसाल हैं। डौड़न्डियो देवी के मैती जसपाल सिंह गुसांई,अमर सिंह गुसांई,शिव सिंह गुसांई,कोतवाल सिंह गुसांई, कुंवर सिंह गुसांई,दयाल सिंह गुसांई एवं अध्यापक धर्मेंद्र सिंह गुसांई ने बताया कि मां कालिका के दरबार में जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से मनोकामना मांगता है,देवी उसकी मनत अवश्य पूर्ण करती हैं। इसी आस्था के चलते मेले के दिन लाखों की संख्या में भक्त दर्शन एवं पूजा के लिए पहुंचते हैं। मेले के दौरान मंदिर परिसर में खिलौने,घरेलू सामान,पूजा सामग्री एवं स्थानीय उत्पादों की दुकानें सजती हैं। दूर-दराज से आए लोग एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं,जिससे यह मेला केवल धार्मिक ही नहीं,बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बन जाता है। मंदिर समिति के संरक्षक रवीन्द्र सिंह नेगी,अध्यक्ष नारायण सिंह बिष्ट,उपाध्यक्ष पुष्कर सिंह बिष्ट एवं सदस्य शम्भू सिंह ने बताया कि जन सहयोग से मंदिर को आज एक भव्य स्वरूप दिया गया है। समिति ने सभी श्रद्धालुओं से शांति,अनुशासन एवं स्वच्छता बनाए रखने की अपील की है। साथ ही मेले के सफल आयोजन के लिए दोनों जिलों के प्रशासन से सहयोग हेतु पत्र भेजे जाने की बात भी कही गई है। डौन्डियोंखाल मेला आज भी यह संदेश देता है कि देवभूमि की आस्था,परंपरा और संस्कृति समय के साथ बदलते स्वरूप में भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है और यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।